शिक्षा व्यवसाय नही बल्कि हमारा गौरव है-- देव दत्त शर्मा,कसौली, हिमाचल प्रदेश
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अगर शब्द न होते... जगदीश बाली
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किसानों को कृषि उत्पाद बेचने की खुली आजादी देंगे कृषि सुधार कानून
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किसानों को कृषि उत्पाद बेचने की खुली आजादी देंगे कृषि सुधार कानून
डॉ मामराज पुंडीर
राजनितिक शास्त्र प्रवक्ता
9418890000
mamraj.pundir@rediffmail.com
आज विश्व को इन्सान से इन्सान को टच करने से फेलने वाली महामारी ने जकड़ रखा है ।इसलिए भारतीय संस्कृति का प्रतीक नमस्ते को अपनाने के लिए पूरा संसार मजबूर हो गया है और hi और bye जेसी दक्षिणी सोच से भी छुटकारा मिल गया है । परन्तु वर्तमान स्तर के दौरान कृषि के क्षेत्र मे जो बदलाव आयेंगे उनसे दलालों की भूमिका निभाने वाले कुछ दलालों को जरुर बाय मिल जायेगा । इस विषय पर राजनीती भी शुरू हो गई है और क्यों न हो, आखिर वोट बैंक जो खिसक जायेगा । लोकतंत्र खतरे मे है । किसान आतम हत्या करेगा, पूंजीवादी लोग राज करेंगे, जैसे नारों का लगना अब शुरू होगा ।
परन्तु मेरा प्रशन इन राजनितिक पार्टियों से है कि जिसमे कांग्रेस सहित यूँ कहिये मोदी विरोधी सभी पार्टियां आती है । क्या आप लोग सच मे किसानों के साथ है या आपका वोट बैंक खिसक गया है । आप जबाब नही डोज, जनता भी सचाई से वाकिफ है तभी आप सत्ता से बाहर हो और हालात आगे भी अच्छे नही ।
मोदी सरकार बनने के बाद देश की जनता को कुछ क्रन्तिकारी फैसलों की उम्मीद जागी और जागती भी क्यों न , किसानों से सबंधित बिल तो कांग्रेस के मेनिफेस्टो में भी था । बस आपके पीला से गेंद हडप ली है । अब सिर्फ आप लोग चिल्लाह सकते है । आखिर ऐसा क्या है इस बिल में जिसे केंद्रीय सरकार ने लोकसभ के साथ साथ राज्य सभा मे भी पास करवा दिया है । भल्ले ही शिरोमणि अकाली दल ने साथ छोड़ दिया हो ।
केन्द्र की मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी में आखिरकार किसानों को उपज बेचने की आजादी दी है, संविदा खेती का अवसर दिया है। कल लोकसभा में और अब राज्यसभा मे कृषि सुधार के लिए पास हुए दोनों विधेयक किसानों को हक देते हैं कि वे अपनी उपज चाहे मंडी, बाजार जहां चाहें बेचें। इन बिलों को किसानों की समृद्धि का कारक बताते हुए केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने लोकसभा में साफ कर दिया है कि अब वक्त आ गया है कि देश के अन्नदाता किसानों को वाजिब मूल्य हर स्थिति में मिले। श्री तोमर ने लोकसभा के पटल से देश के किसानों को आश्वस्त कर दिया है कि उपज की सरकारी खरीदी व न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी था, जारी है और इस बिल के बाद पूर्व की तरह जारी रहेगा। बिल को ऐतिहासिक बताते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी ट्वीट किया है कि यह बिल किसानों को बिचौलियों से मुक्ति देने वाला है। यह देश के किसानों के लिए ऐतिहासिक क्षण है। असल में यह बिल किसानों को विक्रय के और अधिक विकल्प देकर उनको और अधिक सशक्त करेगा।कोरोना संकट के दौरान कृषि सुधार के लिए कल लोकसभा में पास हुए कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य संवर्धन और सरलीकरण विधेयक 2020 और कृषक सशक्तिरण और संरक्षण कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 देश भर में चर्चा में हैं। इन्हें कृषि सुधार की दिशा में मोदी सरकार का क्रांतिकारी कदम बताया जा रहा है। इन्हें किसानों को आर्थिक मजबूती देने वाला बड़ा कदम बताया जा रहा है। असल में 2014 में सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार तेजी से काम कर रही है। इन विधेयकों पर कल बहस में कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा कि 2014 से मोदीजी के नेतृत्व में गांव, गरीब एवं किसान आगे बढ़े हैं। यूपीए सरकार के समय में में 12 हजार करोड़ का कृषि बजट था जबकि मोदी सरकार ने खेती और किसानों की परवाह करते हुए इसे बढ़ाकर 1 लाख 34 हजार करोड़ का कृषि बजट कर दिया है। हमारी सरकार ने किसानों के खाते में 75 हजार करोड़ दिए। हमने पीएम किसान योजना के जरिए आय संहिता योजना प्रारंभ की और किसानो के खाते में 92 हजार करोड़ रुपए डीवीडी के जरिए किसानों के खाते में जमा कराए हैं। कृषि मंत्री श्री तोमर ने बताया कि किस कदर एफपीओ के जरिए किसानों की उन्नति व समृद्धि का मार्ग तैयार किया जा रहा है। हमने 10 हजार एफपीओ मंजूर किए हैं ताकि उन्हें तकनीकी सहयोग मिल सके। ये एफपीओ 6 हजार 850 करोड़ रुपए की लागत से तैयार किए जा रहे हैं। मोदी सरकार किसानों को कर्ज देने में भी आगे है। यूपीए ने जहां 8 लाख करोड़ किसानों के कर्ज के लिए दिए थे वहीं मोदीजी ने किसानों के लिए कर्ज दुगुना करते हुए 15 लाख करोड़ मंजूर किए हैं।श्री तोमर ने बताया कि हम जानते हैं कि कोरोना के कारण किसानों के सामने किस तरह के संकट हैं। हमारी सरकार ने आत्मनिर्भर पैकेज के तहत कृषि अधोसंरचना के लिए 1 लाख करोड़ रुपए दिए साथ ही 1128 करोड़ रुपए देश भर में सहकारी समितियों को भी दिए।श्री तोमर ने इन उदाहरणों से साफ कर दिया कि मोदी सरकार ने यह पैसा कोरोना संकट के समय एक माह के अंदर फैसला करते हुए दिया इससे सरकार की संवेदनशीलता स्पष्ट है।वे कहते हैं सरकार निरंतर प्रतिबद्ध है कि बुआई का रकबा, उत्पादन, जैविक खेती बढ़े।अपनी बात रखते हुए कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने साफ किया कि मोदी सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के प्रति वचनबद्ध है और इस सरकार ने समर्थन मूल्य को डेढ़ गुना बढ़ाकर इसका प्रमाण भी दिया है। श्री तोमर ने यूपीए सरकार को उलाहना देते हुए कहा कि कृषि विशेषज्ञ स्वामीनाथन की कृषि संबंधी रिपोर्ट मंजूर करने में दस साल के कार्यकाल के बाबजूद यूपीए सरकार पीछे रही जबकि मोदी सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को मंजूर करते हुए किसानों को राहत दी। हम मूल्य आश्वासन बिल इसलिए लेकर आए ताकि देश के 86 प्रतिशत छोटे किसानों को भी निवेश का मौका मिले। उनके सामने भी प्रोसेसर, स्टार्टअप के अवसर आएं। इसके लिए किसान और करारकर्ता छोटे छोटे रकबे जोड़कर बड़े क्षेत्र की खेती कर सकते हैं जिससे करारकर्ता और किसान एक दूसरे की आमदनी बढ़ाने में सहभागी होंगे। यह करार किसानों के हक की पहले और मजबूत बात करेगा। उसकी देनदारी कभी भी उसकी जमीन पर नहीं आएगी और न ही उस पर किसी तरह का जुर्माना लगेगा। इसके विपरीत करारकर्ता और व्यापारी अपना दायित्व पूरा न करने पर जुर्माना भरेंगे। लोकसभा में मूल्य आश्वासन बिल की खूबियां बताते हुए कृषि मंत्री ने कांग्रेस के घोषणा पत्र का पेजवार हवाला देते हुए बिल के विरोध करने वालों पर सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने साफ किया कि इस बिल से संबंधित सुधार जब आपने अपने घोषणा पत्र में शामिल कर रखे थे तो आज सदन में आप इसका विरोध करके अपने संकल्प से क्यों पीछे हट रहे हैं। हम आज जो बिल लेकर आएं हैं वो देश में लायसेंसराज खत्म करेगा। किसान एक राज्य से दूसरे राज्य में उपने उत्पाद और उपज अधिक मुनाफे के लिए बेच सकेगा। ईप्लेटफार्म से किसानों की पहुंच बढ़ेगी। देश की 585 मंडियों में ईप्लेटफार्म के प्रति इतनी लोकप्रियता रही कि अब तक 35 हजार करोड़ रुपए का व्यापार इस पर हो चुका है। कृषि मंत्री तोमर ने साफ कर दिया कि यह बिल किसानों के हाथ खोलेगा, उसकी पहुंच बढ़ाएगा। उसे तीन दिन में उपज का पेमेंट दिलाएगा। किसान जब मनचाही जगह उपज बेचेगा तो उपज के खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, इसमें अधिक व्यापारी काम करेंगे जिससे निश्चित ही रोजगार के अवसरों में इजाफा होगा। लोकसभा में इस बहस के दौरान कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने स्वामीनाथ रिपोर्ट के साथ किसान नेता शरद जोशी की सिफारिशों का जिस तरह हवाला दिया वो उनकी बात को सदन में मजबूती देने वाला रहा। श्री तोमर ने बताया कि किन किन बातों को लेकर संघर्षशील किसान नेता जोशी जी लड़ते रहे थे और उन सारी मांगों को ये दोनों विधेयक निर्णायक ढंग से पूरा करने वाले हैं। कुल मिलाकर मोदी सरकार के इन कृषि सुधारों विधेयकों पर कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने जिस गहराई से अपनी बात रखी उससे उनकी गांव के जमीनी किसान नेता व किसानपुत्र छवि सदन में फिर एक बार स्थापित हुई। वे सदन को कृषि मंत्री और एक किसान दोनों रुपों में समझाते दिखे। आसान शब्दों में तर्कपूर्ण जवाबों के साथ विधेयक का पास होना तोमर की निर्णायक सफलता रही। अब देखना ये कि कितनी जल्दी यह विधेयक कानून बनकर देश के किसानों को उपज बेचने की आजादी के साथ उन्हें आर्थिक आत्मनिर्भरता देता है। तब तक निश्चित ही देश के किसान इस विधेयक पर हो रही हर चर्चा पर निरंतर ध्यान लगाए रहेंगे।
वो यात्रा जो सफलता से अधिक संघर्ष बयाँ करती है उन्हें नरेन्द्र मोदी कहते है
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वो यात्रा जो सफलता से अधिक संघर्ष बयाँ करती है उन्हें नरेन्द्र मोदी कहते है
डॉ मामराज पुंडीर
राजनितिक शास्त्र प्रवक्ता
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mamraj.pundir@rediffmail.com
आज भारत विश्व में अपनी नई पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है। वो भारत जो कल तक गाँधी का भारत था जिसकी पहचान उसकी सहनशीलता थी, आज मोदी का भारत है जो खुद पहल करता नहीं, किसी को छेड़ता नहीं लेकिन अगर कोई उसे छेड़े तो छोड़ता भी नहीं। गाँधी के भारत से शायद ही किसी ने सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक जैसे प्रतिउत्तर की अपेक्षा की होगी। उसके बाद अब डोकलाम विवाद और फिर गलवान घाटी में चीन को अपने जवाब से भारत ने विश्व में अपनी इस बदली हुई पहचान की मुहर लगा दी है। उससे बड़ी बात यह है भारत की इस नई पहचान को विश्व बिरादरी सहजता के साथ स्वीकार भी कर चुकी है। जो की वैश्विक राजनीति में भारत की कूटनीतिक एवं रणनीतिक विजय की परिचायक है।भारत की यह नई पहचान इसलिए भी विशेष हो जाती है क्योंकि उसे यह पहचान दी है एक ऐसे नेता ने जिसके जीवन की शुरुआत बेहद साधारण रही। जिसका जन्म किसी राजनैतिक परिवार में नहीं हुआ। जिसका केवल बचपन ही नहीं पूरा राजनैतिक जीवन ही संघर्षपूर्ण रहा। एक चाय वाले से एक प्रचारक, एक प्रचारक से एक मुख्यमंत्री और एक मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बनने तक का उनका यह सफर बहुतों के लिए प्रेरणादायक है खास तौर पर युवाओं के लिए। शायद वो भी अपनी इस ताकत को जानते हैं इसलिए भले ही अपनी वर्तमान योजनाओं के केंद्र में वो गरीबों और वंचितों को रखें लेकिन उनकी भविष्य की योजनाओं का केंद्र तो देश के युवा ही होते हैं। युवाओं और बच्चों से साल भर वो भिन्न भिन्न माध्यमों से जुड़े रहते हैं। चाहे परीक्षा पे चर्चा हो या चंद्रयान छोड़े जाने के कार्यक्रम में बच्चों की भागीदारी। इन बच्चों में वो देश का भविष्य देखते हैं तो इन बच्चों को उनमें अपना एक अभिभावक नज़र आता है। यही कारण है कि देश की नई शिक्षा नीति के जरिए मोदी इन बच्चों में छुपे वैज्ञानिक और इंजीनियर ही नहीं बल्कि इनमें छुपे चित्रकार और गीतकार को भी जगाना चाहते हैं। ताकि वे जितनी गहराई से विषय को समझें उतनी ही शिद्दत से मानवीय संवेदनाओं को भी महसूस करें। क्योंकि वो जानते हैं कि भारत को आज जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है उन सब का मूल भ्रष्टाचार है और भ्रष्टाचार का मूल दूसरों के अधिकारों तथा अपने दायित्वों के प्रति संवेदनहीनता है। शायद इसलिए एक तरफ वो युवा आईएएस अधिकारियों एवं पुलिस कर्मियों से व्यक्तिगत संवाद करके उन्हें आमजन के प्रति अपने कर्तव्यों का एहसास कराते हैं तो दूसरी तरफ “मन की बात” से आम जनता से रूबरू होकर उन्हें देश और देशवासियों के प्रति उनके दायित्वों का बोध कराते हैं। विशेष बात यह है कि उनकी इन साधारण सी लगने वाली महत्वपूर्ण बातों को देशभर के लोगों का भारी समर्थन देखने को भी मिलता है। चाहे नोटबन्दी हो या स्वच्छता अभियान। राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें मिलने वाले समर्थन के आगे विपक्ष का राजनैतिक विरोध ध्वस्त हो जाता है। कोरोना काल में जनता कर्फ्यू से लेकर उनकी एक अपील पर देश भर में घंटियों की गूंज ने विश्व के शक्तिशाली से शक्तिशाली नेताओं की नींद उड़ा दी। यही कारण है कि चाहे विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमरीका के राष्ट्रपति हों वो चुनावों से पहले अमेरिका में बसे भारतीयों को आकर्षित करने के लिए “हाऊडी मोदी” कार्यक्रम करवाते हैं तो इस्रायल जैसे देश के राष्ट्रपति चुनावों से पहले मोदी के साथ अपनी मित्रता के बैनर लगवाते हैं।
कोरोना जैसी महामारी जिसने यूरोप के विकसित देशों से लेकर अमेरिका तक को हिला दिया वहाँ भारत के गांव गांव तक कोरोना से बचने के लिए मास्क का उपयोग और हाथ धोने को लेकर आमजन की जागरूकता देखते ही बनती है। कोरोना से भारत जैसा गरीब देश इस प्रकार से लड़ लेगा इसकी विश्व में किसी ने अपेक्षा नहीं की थी। ऐसा लगता है कि इतनी सहजता और सरलता से असंभव को संभव बनाने में मोदी को जैसे महारथ हासिल है। तभी तो संविधान से धारा 370 का हटना हो या राम मंदिर का ऐतिहासिक फैसला ,सरकार के इन कदमों से नरेंद्र मोदी ने देशवासियों के दिलों में वो जगह बना ली जो कल्पना से परे है। वडनगर के एक साधारण से स्कूल से शिक्षा अर्जित करने वाला विद्यार्थी विदेशों के बड़े बड़े विश्वविद्यालयों से बड़ी बड़ी डिग्री धारी नेताओं के लिए इतनी लंबी लकीर खींच देगा किसने सोचा था। राजनैतिक परिवार में पैदा होने वाले एवं राजनैतिक वातावरण में पलकर बड़े होने वाले ऐसे नेता जो राजनीति में टिके रहने के लिए इसे ही अपनी सबसे बड़ी शक्ति मानते थे उनके लिए नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्तित्व का प्रधानमंत्री बनना एक सबक है।
खुद मोदी के शब्दों में, मैं मुख्यमंत्री बनने से पहले मुख्यमंत्री के दफ्तर नहीं गया। मैं सांसद बनने से पहले संसद भवन नहीं गया। और प्रधानमंत्री बनने से पहले प्रधानमंत्री कार्यालय नहीं गया।
जब ऐसा नेता मुख्यमंत्री बनता है और तमाम राजनैतिक विरोध के बावजूद भारी जनसमर्थन से लगातार तीन चुनाव जीतता है। यह नेता जब बना सके।”चौकीदार चोर है के नारों के बावजूद पहली बार से भी अधिक बहुमत से प्रधानमंत्री बनता है तो यह यात्रा उसकी सफलता से अधिक उसके संघर्ष को बयान करती है। वो संघर्ष जो उनके व्यक्तित्व को बयान करता है। वो व्यक्तित्व जो इन शब्दों से परिभाषित होता है कि “एक सफल व्यक्ति वह है जो औरों द्वारा अपने ऊपर फेंके गए ईंटों से एक मजबूत नींव रख कर समाज और देश का निर्माण करते है।
भारतीय जनता पार्टी की सरकार भी इस मजबूत राष्ट्र प्रेमी के आस पास घुमती है । राज्य की जनता भी अपने नेताओं में मोदी जी को देखकर अपना मत देता है । हाल ही मे मोदी जी ने उनको सम्मान स्वरूप दिए गिफ्ट की नीलामी कर 103 करोड़ की राशी देश के जरूरत मंद लोगो को दान की । यह पहली बार नही हुआ, अपितु जब भी राष्ट्र को जरूरत होती है मोदी जी का हमेशा एक सिपाही की तरह आगे वाली पंक्ति में खड़े होते है । कहते है लोग स्वामी विवेकानन्द के साथ साथ मोदी जी को राम राज्य के संस्थापक के रूप में जनता देखती है ।
हिंदुस्तान की जनता हमेशा इस नेता को सलाम करती रहेगी
अभिनन्दनीय है-अभिनन्दन ग्रन्थ -- आचार्य ओमप्रकाश 'राही'
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संस्मरण - श्री सुरेश भारद्वाज, शिक्षा मंत्री हिमाचल प्रदेश
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हिमाचल में शतरंज की संभावनाएं-- हंस राज ठाकुर
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विद्यार्थी के सर्वागीण विकास हेतु शिक्षा के साथ खेलें भी परमावश्यक हैं I हर खेल का अपना महत्त्व है व विद्यार्थी अपनी रूचि व कौशल के हिसाब से खेल का चयन करता है I वर्तमान स्कूली शिक्षा में लगभग सारे खेल विद्यार्थी के शारीरिक विकास के साथ जुड़े हैं – यहाँ बात करेंगे मानसिक संवर्धन से जुड़े खेल शतरंज की I
'शतरंज एक ऐसा खेल – नहीं है कोई जिसका मेल'
विश्वनाथन आनंद का नाम कौन नहीं जानता- पांच बार का विश्व चैंपियन वो भी अलग अलग फॉर्मेट में I हमारे देश के प्रधानमंत्री मोदी जी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे उन्होने शतरंज की खूबसूरती को पहचाना व देश के हर नागरिक के लिए इसे खेलना जरुरी बताया – उन्होने शतरंज को सौ दुखों के एक हल के रूप में परिभाषित किया I परिणामस्वरूप नयी शिक्षा नीति में भी शतरंज को तवज्जो मिली और हिमाचल प्रदेश सरकार ने अपने सौ दिन के एजेंडे में शतरंज, योग व संगीत को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने को मंजूरी दी I सौभाग्यवश, पिछले दो सालों में ही सरकार के इस मिशन को शिक्षा विभाग व प्रदेश के शतरंज प्रेमियों ने पहली से बाहरवीं कक्षा तक इसे स्कूली खेलों का अनिवार्य हिस्सा बना डाला I आज हिमाचल प्रदेश देश का ऐसा राज्य बन गया है जहाँ खेलों के साथ इसे स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा भी बनाया जा रहा है व इस दिशा में विकास के मामले में गुजरात , तमिलनाडु से अग्रणी नजर आ रहा है जो अपने आप में एक मिसाल है I
तत्कालीन शिक्षा सचिव हिमाचल सरकार ने दिसम्बर 2018 में संयुक्त निदेशक प्रारम्भिक शिक्षा की अध्यक्षता में राज्य शिक्षा कौंसिल सोलन की सहभागिता से प्रदेश शतरंज पाठ्यक्रम समिति का गठन किया, जिसमे प्रदेश के शतरंज प्रेमी शिक्षक भी सदस्य हैं I शिक्षक व शतरंज प्रेमी सदस्यों के सहयोग से यह कार्य जल्दी संपन्न कर लिया गया व पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने व आगामी क्रियान्वयन हेतु राज्य शिक्षा कौंसिल सोलन के पास विचाराधीन है I सरकार के एजेंडे के अनुसार बहुत जल्द प्रदेश के सरकारी स्कूलों में चैस क्लब भी देखने को मिल सकते हैं I
शतरंज -मानसिक संवर्धन के साथ साथ विविधता का खेल है , जिसे प्रकृति भी बाधित नहीं कर सकती ,ऐसा खेल जिसे दस वर्ष का खिलाडी भी सौ वर्ष के खिलाडी के साथ खेल सकता है -जो किसी भी समय , किसी भी मौसम और किसी भी हालत में कहीं पर भी खेला जा सकता है वो भी बहुत कम खर्चे पर I वार्षिक स्कूली खेल प्रतियोगिता के दौरान बरसात में जहाँ सब मैदानी क्रीड़ायें बंद हो जाती हैं , शतरंज का खेल कमरों में भी निर्वधित जारी रहता है I सभी सरकारी विद्यालयों में माकूल खेल संसाधन भी उपलब्ध नहीं है I
शतरंज के खेल में प्रदेश से अभी तक कोई भी खिलाडी चैस मास्टर ,फीडे मास्टर ,इंटरनेशनल मास्टर या ग्रैंड मास्टर नहीं बन पाया है क्योंकि इस छोटे से प्रदेश में सशक्त शतरंज संघ नहीं होने की वजह से ओपन स्पर्धाओं में भी कोचिंग संस्थान व प्रशिक्षण के अभाव में खिलाडी ज्यादा बेहतर नहीं कर पाए और आज तक विश्व शतरंज पटल पर कोई हिमाचली अपना रंग नहीं जमा पाया I
पिछले दो सालों में डी.एम.सी.ए जैसे शतरंज संगठनों के चलते हिमाचल प्रदेश में शतरंज की बयार देखने को मिली है -प्रदेश सरकारी स्कूलों के बच्चों में इस खेल की बढती लोकप्रियता के साथ साथ आज लॉकडाउन जैसी परिस्थिति में जहाँ सब खेल बंद पड़े हैं , शतरंज निर्बाध रूप से ऑनलाइन प्रतियोगिताओं के रूप में आयोजित की जा रही है I यहाँ तक की इस संकट काल में शतरंज खिलाडी इस ऑनलाइन खेल से कोरोना फाइटर की मदद हेतु प्रदेश में सहयोग राशी जुटा पाये हैं I इस खेल की क्षमता से सरकार भी वाकिफ़ है I प्रदेश के शतरंज प्रेमियों को यह भी इंतजार है कि इस बार से शतरंज को अनिवार्य रूप से 19 वर्ष से कम आयु वर्ग के खिलाडियों के लिए भी नियमित रूप से लागू किया जाये -पिछले वर्ष इस वर्ग के ट्रायल में प्रदेश के 11 जिलों से लगभग 100 खिलाडियों ने भाग लिया था I
आज प्रदेश में शतरंज प्रतिभाएं उभर रहीं हैं और विश्व भर में हुए अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि शतरंज खेलने वाले बच्चे अक्सर पढाई में भी अव्वल होते हैं I पिछले वर्ष , अप्रैल माह में मतदाता जागरूकता हेतु चुनाव आयोग की अनुमति से दो हिमाचली प्रतिभाओं हितेश आजाद व हँस राज ठाकुर ने चैस मैराथन का अनोखा विश्व कीर्तिमान बनाया I आज प्रदेश के गाँव गाँव तक स्कूलों के माध्यम से यह खेल लोकप्रिय बन रहा है जबकि योग व संगीत अभी तक दूर की कौड़ी नजर आ रहे हैं I सरकार को शतरंज के क्षेत्र में मानव संसाधन विकसित करने के साथ प्रत्येक जिला स्तर पर खेल विभाग द्वारा संचालित चैस क्लब गठित करने होंगें ताकि उसमे जिला के हर आयु वर्ग के खिलाडी मिलकर युवाओं को इस खेल में और अधिक सशक्त बना सके – प्रदेश को इंटरनेशनल मास्टर स्तर के कोच भी जुटाने होंगे तभी इस नयी पौध को सही दिशा दे पाने में हम कामयाब होंगे I आज कोविड 19 के इस मुस्किल दौर में भी यदि सरकार व शिक्षा विभाग चाहे तो प्रदेश में स्कूली स्तर पर भी घर बैठे बच्चों की ऑनलाइन शतरंज प्रतियोगिताएं आयोजित करवायी जा सकती हैं I
अवधारणा या हकीकत – दोहरी पेंशन व्यवस्था -- हंस राज ठाकुर
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एक आम अवधारणा है कि पेंशन बुढ़ापे का सहारा होती है I वर्तमान के साथ साथ , भविष्य की चिंता करना भी मानव का स्वभाव है I आज देश के लाखों कर्मचारी अपने व परिवार के भविष्य को लेकर चिंतित हैं I स्वभाविक भी है कि 30 -35 वर्षों तक सरकारी क्षेत्र में अपनी सेवा देने के पश्चात सेवानिवृति पर एक-दो हजार रुपए की पेंशन से परिवार व कर्मचारियों का बुढ़ापा सुरक्षित नहीं हो सकता I वर्तमान में देश का हर कर्मचारी अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहा है – मुद्दा है पुरानी पेंशन बहाली का I
सी.सी.एस पेंशन रूल-1972, जो 1 जून 1972 से नियमित व सरकारी कर्मचारियों पर लागु होते हैं उनमें संसोधन करके दिसम्बर 2003 से पहले नियुक्त कर्मचारियों तक सीमित कर दिया I कुछ राज्यों में 14 मई 2003 से पहले नियुक्त कर्मचारियों तक I जबकि रेलवे कर्मचारियों , दिहाड़ीदार कर्मचारी , सी.पी.एफ कर्मचारी, या अनुबंध कर्मचारी पर लागु नहीं होते I पेंशन 58 वर्ष की उम्र पर सेवानिवृत होने पर नियमित कर्मचारी को दी जाती है I कर्मचारी एक ही तरह की सेवा या पोस्ट में रहते हुए- दो पेंशन प्राप्त नहीं कर सकता है I दूसरी तरफ माननीयों को एक ही तरह की देश सेवा में दो -तीन बार भी पेंशन का प्रावधान है I कर्मचारियों को सेवाकाल के दौरान यदि किसी अपराधिक मामले में सलिप्त पाया जाये तो पेंशन रोक दी जाती है – दूसरी तरफ माननीयों के खिलाफ़ यदि अपराधिक मामले भी दर्ज होते हैं तो भी पेंशन धारा प्रवाह जारी रहती है I यह दोहरी पेंशन व्यवस्था कर्मचारियों को ठगा सा महसूस करवाती है, एक देश में दो तरह की व्यवस्था क्यों ? क्या कर्मचारी इस देश के नागरिक नहीं , यदि हाँ तो 2003 के बाद चुने गए माननीय इस नई पेंशन व्यवस्था में क्यों नहीं I ऐसे दोहरे मापदंड पेंशन व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करते हैं I
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पुरानी पेंशन बहाली देश के हर कर्मचारी की मांग है और अपनी इस मांग पर नेशनल मूवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम के अंतर्गत एकजुट हो खड़ा है I कई राज्यों में लॉकडाउन के चलते जहाँ अन्य गतिविधियाँ स्थगित हैं , नयी पेंशन स्कीम के कर्मचारियों द्वारा प्रधानमंत्री को पुराणी पेंशन बहाली बारे खून से पत्र लिखने की मुहिम जोर पकड़ने लगी है I
एक जनवरी 2004 से देश में नई नेशनल पेंशन स्कीम लागु की गयी थी I इस तिथि के बाद केंद्र सरकार व राज्य सरकार में नौकरी पाने वाले कर्मचारियों को पुरानी पेंशन व्यवस्था से बाहर कर दिया गया I हिमाचल सहित कई राज्यों में यह व्यवस्था केंद्र से भी पहले 14 मई 2003 को लागू कर दी गई I
हाल ही में केंद्र सरकार के उन कर्मचारियों के लिए राहत भरी ख़बर आयी कि 1 जनवरी 2004 से लेकर 28 अक्टूबर 2009 के बीच अपनी सर्विस बदली है अर्थात वे कर्मचारी जो इस अवधि के दौरान पुरानी सेवा छोड़कर किसी दुसरे विभाग में आ गए थे और इस वजह से वे पुरानी पेंशन व्यवस्था से बाहर हो गए थे , उन्हे पुरानी पेंशन व्यवस्था में शामिल कर दिया गया I
आज भी हज़ारों मामले न्यायलयों में लंबित हैं जो वर्ष 2003 से पूर्व सेवा में नियुक्त हुए थे और 14 मई 2003 के बाद नियमित हुए I वर्तमान परिदृश्य में देश का हर कर्मचारी पुरानी पेंशन से वंचित है और पुरानी पेंशन बहाली की यह मांग आज देश में व्यापक स्तर पर होने लगी है I कर्मचारी अपना पूरा जीवन देश सेवा में लगा देता है और बुढ़ापे में अपने आप को असहाय महसूस करने लगा है, नयी नेशनल पेंशन स्कीम में लगे अपने पैसे को भी सुरक्षित नहीं पा रहा है, उसका यह पैसा जोखिमों के अधीन है I
केंद्र सरकार ने सेवा के दौरान कर्मचारी की मृत्यु पर उसे पुरानी पेंशन का प्रावधान भी किया है, मगर कई राज्यों में यह भी अभी तक लागु नहीं हो पाया है I कर्मचारी सरकार की विकास योजनाओं को धरातल पर फलीभूत करने वाला सहयोगी होता है I नई नेशनल पेंशन स्कीम के तहत वर्तमान में जरुरत के समय पर जमा की गयी अपनी सम्पूर्ण धनराशी को निकलने की कोई व्यवस्था नहीं है I वर्तमान में कर्मचारियों के मूल वेतन व ग्रेड पे का 10% हिसा काटकर विभिन्न फण्ड मनेजरों के माध्यम से शेयर बाजार में लगाया जाता है I शेयर बाज़ार में लगाया यह करमचारियों का पैसा शेयर बाजार लुढकने के साथ ही लुढ़क जाता है , और कई बार तो मात्र 12 दिनों में कई एन.पी.एस खाता धारकों को 10000 से भी ज्यादा का आर्थिक नुक्सान उठाना पड़ा है,क्योंकि शेयर बाजार जोखिमों के अधीन रहता है और कर्मचारी अपने पैसे व् बुढ़ापे की सुरक्षा चाहता है I
पेंशन प्रणाली में आर्थिक सुरक्षा सभी कर्मचारियों की मांग है और जायज भी नज़र आती है I केंद्र व् राज्य सरकारों को कर्मचारियों की इस मांग पर चिंतन व् मनन करना होगा , क्योंकि सरकार का हिसा भी, कर्मचारी के हिस्से के बराबर इस नयी पेंशन स्कीम में जाता है यदि सरकार पुरानी पेंशन व्यवस्था लागु करती है तो जहाँ सरकार को अपना हिस्सा कर्मचारी को नहीं देना पड़ेगा ,वहीं कर्मचारी का पैसा भी सरकार के पास ही रहेगा , जो कर्मचारी की सेवानिवृति से पहले कई विकास योजनाओं में लगाया जा सकता है I दोहरी पेंशन व्यवस्था की कुंठा से भी कर्मचारी मुक्त हो पायेगा I सरकार के विकासात्मक कार्य भी और अधिक पकड पायेंगे I
हंस राज ठाकुर गाँव व् डाकघर बग्गी जिला मंडी ( हि प्र )
बेज़ुबान जीवों पर अत्याचार अमानवीय -- जगदीश बाली
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"पर्यावरण प्रदूषण वर्तमान विश्व की बड़ी चुनौती" -- हंसराज ठाकुर
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ऑनलाइन शिक्षा कितनी उपयोगी- प्रियम्बदा शर्मा
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शिक्षा, विधि एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश भारद्वाज ने आज यहां वीडियो काॅन्फ्रेंसिंग -- डा माम राज पुंडीर
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आओ बच्चो, शतरंज खेलें -- जगदीश बाली
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भीड़ -- जगदीश बाली
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मीडिया व न्यूज़ एंकरों की सीमा रेखा-- जगदीश बाली
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बढता ताप घटता पानी कटते जंगल: कैसे होगा मानव मंगल --जगदीश बाली
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कैसे बढ़े शिक्षा की गुणवत्ता : एक शिक्षक का दृष्टिकोण - डॉ मामराज पुंडीर ( विशेष कार्य अधिकारी शिक्षा मंत्री , हिमाचल सरकार)
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