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शिक्षा व्यवसाय नही बल्कि हमारा गौरव है-- देव दत्त शर्मा,कसौली, हिमाचल प्रदेश

हालातों को देखते हुए सरकार को कुछ सख्त कदम उठाने होंगे और शिक्षा मौलिक आधार का अक्षरहाक्षर पालन अनिवार्य किया जाना चाहिए। प्रत्येक भी • जनता बच्चे तक अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा को आम करना चाहिए कि भी व्यापारी लूट सूरत में कोई भी भा का कोई भी आदमी शिक्षा व्यवसायी बन कर भोले भाले अभिभावकों को शिक्षा के नाम पर न ही उनसे बेवकूफ न बना सके और न कर सके। इस मनमानी फीस वसूल कर

आयाम भी होते हैं, परन्तु हम पूर्ण विश्वास के साथ कह सकते हैं कि बिना शिक्षा के किसी देश, राज्य या परिवार की प्रगति संभव हो ही नहीं सकती। शिक्षा के बिना मानव पूछ विहीन पशु के समान है, हा संस्कृति के में सहायक होती है निर्माण में और मानव को अन्य चौरासी लाख मचा प्राणियों की तुलना में श्रेष्ठ भी बनाती है।

अब जरा विडंबना देखिए कि लोगों के जीवन को गढ़ने वाली ये पाठशालाएं आजकल एक समृद्ध व्यवसाय का रूप ले चुकी है जिसने अच्छी शिक्षा को पैसे वालों की धरोहर बना कर रख दिया है। अब साधारण तथा मध्यमवर्गीय परिवार इन फाइव स्टार से दीखने वाले स्कूलों को से टकटकी लगाकर ललचाई आंखों देखते हैं और सोचते हैं कि काश, काश

शिक्षा एक जीवन पर्यन्त चलने वाली सतत प्रक्रिया है, जिससे मनुष्य का न केवल बौद्धिक विकास होता है बल्कि उनका बच्चा भी ऐसे स्कूलों में पढ़ पाता। न जरा सोचिए कही हम ही तो इन सब के फूटी अंग्रेजी बोलने में भी स्वयं किया जाए तथा फीस इतनी हो कि निर्धन उसका शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास भी होता है। अनेकों शिक्षाविदों के द्वारा समय समय पर किए गए शोध इस का प्रमाण है। अब

न जाने हम सब अपने बच्चों को किस कोशिश कर रहे है। अधिकतर लोग यह लाये हमारे देश में शिक्षा का महत्व है ये के कमरों में हिंदी में अंग्रेजी माध्यम की सोचते हैं कि जो स्कूल जितना महगा होगा कर भी लेते हैं परंतु गांव देहातों में फीस बसती है, जो निर्धन वर्ग में आती है और वहां पढ़ाई भी उतनी ही उत्तम होगी बस इसी भ्रम में पड़ कर हम अधी बच्चों को करोड़ों बच्चे हर सुबह अपनी पीठ पर अतिशयोक्ति न होगी। आज यदि आज अनुकरणीय दौड़ में दौड़ पड़ते यदि फीस का जुगाड़ हो जाए उसके साथ उन्हें भी शहरियों के बराबर हक मिलना लाभ उठाते हुए खूब मन भावन मन लुभावन सब्जबाग दिखा कर हिप्नोटाइज़ करता है और हम, हम अपने बच्चों को रहा है कि

हा है।

शायद किसी को बताने की जरूरत नहीं है हर रोज ग्रामों और शहरों में भारत के जाते हैं। हर माता-पिता की इच्छा रहती है कि उनका बच्चा पढ़-लिखकर एक महान और काबिल इंसान बने और दुनिया में के सपनों करने व्यवस्था बहुत बड़ी भूमिका अदा करती संपन्नता उस देश की जनसंख्या के साक्षरता के अतिरिक्त अनेकों अन्य •

है। स्पष्ट सी बात है कि किसी भी देश की साक्षरता अनुपात पर ही निर्भर करती है। यद्यपि संपन्नता को मापने के लिए ये शिक्षा के व्यापारी लोगों की मनःगति बहुत अच्छे से पढ़ चुके है। क्योंकि हर माता पिता अपनी सन्तान को डॉक्टर इंजीनियर से अतिरिक्त कुछ बनाना चाहते ही नहीं है जो बुरी बात भी नहीं परन्तु

केवल शहरों में ये हाल केवल में होता भाता परन्तु आजकल तो, गांवों में भी तो भी र किराये गली मोहल्ले में दो चार पढ़ाई हो रही है। जिसे यदि इंग्लिश न कह कर हिंगलिश माध्यम कहे तो कोई दवाई जाए तो तो हम देखेंगे कि इन स्कूलों में केवल निर्धन वर्ग के लोगों के बच्चे ही पढ़ने के लिए आते है, क्योंकि बड़ी-बड़ी वसूली की जाती ही अदा कर पाते है।

आज के आधुनिक दिखावे दौर में मनपसंद स्कूल में प्रवेश लेना ही अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। मध्यम पसंद के स्कूल में यदि पढ़ाना चाहे तो चांदी बटोरते हैं। को यदि आपकी इच्छा है तो उसकी फीस

बच्चे की क्षमता को कोई देख नहीं रहा तभी तो आज अच्छी और उच्च शिक्षा का निरन्तर व्यवसायीकरण हो रहा है। निजी शिक्षण संस्थानों के संचालको के पी बारह हो रहे हैं। वे इसी भावना का लाभ या यूँ कहें शिक्षा के खुले बाज़ार में लूट में पढ़ाने का सपना नहीं देख मचा रखी है।

के हर वर्ष इन शिक्षा की दुकानों में एक तरफ ग्राहक बढ़ रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ स्कूल को फीस बढ़ती ही जा रही है है । क्या कभी किसी ने गौर किया कि जितनी रफ्तार से फीस रही है उतनी बढ़ ही गति से शिक्षा का स्तर भी बढ़ रहा है? मानसिकता का लाभ शायद नही बल्कि ये स्तर दिन प्रतिदिन नीचे नीचे और नीचे ही गिरता जा रहा है। क्या कभी। किसीने सोचा है कि सबके लिये कौन जिम्मेवार है ? नहीं ल लिए जिम्मेदार तो नहीं?

ही आज पच्चास हजार से एक लाख तक अदा करनी पड़ सकती है। यही नहीं यदि आपको अच्छे स्कूल में अपने बच्चे को पढ़ाना है तो आपके बैंक बैलेंस भी अच्छा खासा होना चाहिये अन्यथा आप अपने का इस सकते।

आज पश्चिमी सभ्यता का हम पर पर ऐसा प्रभाव देखने मिलता है कि हम आजकल किसी की भी योग्यता को अंग्रेजी ज्ञान के पैमाने आँकने लगए हैं। जिसको जितनी की इस अंग्रेजी आती है उसको उतना ही बुद्धिमान समझा लगा है। लोगो जाने लगा लाभ उठाते हुए शिक्षा को शिक्षा के इन व्यापारियों ने वेस्टर्न कल्चर कि मोड़ दिया | आजकल लोग तरफ अपनी मातृभाषा या मां बोली को बोलने में शर्म महसूस करने लगे हैं तथा टूटी गौरवान्वित समझने लगे हैं। इस

" शिक्षा के क्षेत्र में इस मनमानी को रोकने के लिए सरकार को चाहिए कि वह सबसे पहले शिक्षा के व्यवसायीकरण पर रोक लगाये। सभी निजी शिक्षण संस्थाओं फीस का ढाँचा सरकार द्वारा स्वयं तय से निर्धन वर्ग के बच्चे भी उन शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर सके जिन में की एक बड़ी आबादी ग्रामीण परिवेश जो इतने साधन संपन्न नहीं है कि शहर जा है। कर भारी भरकम फीस अदा कर सके

जहाँ तक बात है शहरों की वहाँ शिक्षा का व्यवसायी और व्यापारीकरण हो रेस / प्रतिस्पर्धा में आगे निकालने की तो संसाधन पर्याप्त मात्रा में होने के कारण वे दाखिला लेना चाहें क्योंकि भारत देश लोग इस दौड़ में कुछ सफलता हासिल ना होने के कारण कुछ लोग तो अपने स्कूल भेजने में असमर्थ हो गये हैं जो उनकी पहुंच से कास बहुत चाहिए। होते हैं। शिक्षा का व्यवसाय आज इतना फलफूल स्कूल वालों साथ कर दिया है। स्कूल अपने ही किसी सगे सम्बन्धी को उक्त विचार करना होगा कि शिक्षा कोई काम का ठेका दे देते हैं जिससे वो तो वर्गीय परिवार अपने बच्चों को उनकी लाभ लेते ही हैं साथ साथ सम्बन्धी भी इसे गौरव बना कर ही रखना होगा ताकि

दूर आज यदि समय की कोई मांग है तो बो हमारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार। यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया उनका और अपना नाम खूब रोशन करे में प्रइवेट शिक्षा संस्थाओं के फीस के रूप उसी महंगे रेस का हिस्सा बना देते हैये के साथ पुस्तक और स्कूल ड्रेस का व्यापार तो हमारे युवाओं का भविष्य अंधेरे को और अब भारतीय व्यवसाय नही बल्कि हमारा गौरव है और देश का हर एक बच्चा उपयुक्त और

हमारे स्कूल और हमारे देश की शिक्षा है, जिन्हें केवल पैसे वाले धनाड्य लोग

शायद नहीं पढ़ा सकते क्योंकि बड़े नामी अब स्पष्ट है कि शिक्षा का व्यापारीकरण गुणपूर्ण शिक्षा को ग्रहण कर अपनाऔर स्कूल में नर्सरी कक्षा में यदि प्रवेश दिलाने दिन प्रतिदिन फलफूल रहा है तो इस पर अपने देश का नाम विश्व में रोशन कर अंकुश कैसे लगे? आज शिक्षा के ऐसे सके।

अगर शब्द न होते... जगदीश बाली

 ईश्वर ने इंसान बनाया और उसे ज़ुबान दी, ज़ुबान के साथ ऐसा नायाब स्वरयंत्र दिया दिया जिसका इस्तेमाल वह बोलने के लिए करता है। बोलने के लिए शब्द चाहिए। अपने ख़्यालों के इज़हार के लिए भी शब्द चाहिए। अगर शब्द न होते तो हम अपने ख्यालों को कैसे व्यक्त करते, कैसे कह पाते, कैसे लिख पाते। शब्द न होते तो किताबें न होती और न ही कुछ पढ़ने पढ़ाने को होता। हम आज की तरह एस.एम.एस न कर पाते, न फ़ैसबुक पर कोई अपनी बात लिख कर स्टेटस डाल पाते। न ही कोई वट्सऐप पर चैट कर पाता, न कोई ट्वीट कर कुछ कह पाता। कुछ आड़ी तिरछी लकीरें होतीं और तस्वीरें होतीं। हम केवल फ़ोटो अपलोड कर पाते। हम इतनी सुगमता से पुराने यार दोस्तों को न खोज पाते। तब कुछ याद रह जाता और बहुत कुछ भूल जाता। कुछ भूली-बिसरी बातें शेष रह जाती। ये यादों के अफ़साने कुछ ही समय बाद दफ़्न हो जाते। कुछ अफ़सानों की कबरें होतीं तो कुछ कबरों के अफ़साने होते। ज़रा कल्पना कीजिए! अगर शब्द न होते तो इंसानों की दुनिया कैसी होती।  
 शब्द न होते, तो हम अपनी बात कैसे कह पाते? हमारी भाषा कैसी होती? हम अपने सुख, दुख, खुशी, उत्साह, न्राराज़गी व गुस्से को कैसे व्यक्त करते? हमारी भाषा भी शायद वनों में विचरण करने वाले खग-मृगों की तरह होती। हमारी भाषा पालतु जन्तुओं की तरह होती और आकाश में विचरण करते पंछियों की तरह होती। हम अगर गुस्सा करते, तो कुत्ते की तरह गुर्राते और चिल्लाना चाहते तो शायद उसी की तरह भौंकते। खुश होते तो इसका इज़हार शायद घोड़े की तरह हिनहिना कर करते या फ़िर गधे की तरह ढेंचु ढेंचु करते। ऐसे में इज़हारे मोहब्ब्त कैसे करते? शायद आंखों के ईशारे से ही सब कुछ समझना पड़ता और दिल जीतने का ये हुनर भी सीखना पड़ता क्योंकि न खत लिख पाते न वैलेंटाइन डे पर ग्रीटिंग कार्ड दे पाते। तब प्रेम कहानी तोता-मैना जैसी ही होती। अगर कोई कोयल की तरह कूक पाता तो उसे लता और रफ़ी की तरह अच्छा गायक समझा जाता। तब गीत न होते और अगर संगीत होता तो केवल प्रकृति का संगीत होता। मंद मंद बहती हवा का होता, कल कल करते नालों का होता और झर झर करते झरनों का होता। 
 बिना शब्दों की दुनिया में हम या तो मिस्टर बीन की तरह होते या चार्ली चैपलिन की तरह होते या फ़िर माइम के किसी एक्टर की तरह। हम किसी गूंगे की कल्पना भी कर सकते हैं। टीवी पर केवल ईशारों से ही समाचार दिखाये जाते और सिनेमा के रुपहले पर्दे की कहानी ‘राजा ‘हरीशचंद्र‘ से ‘आलामारा: तक न पहुंचती। तब केवल चार्ली चैपलिन या मिस्टर बीन जैसे ही अदाकार दिखते। शब्दहीन लोकतंत्र में विरोध के नारे न लगते, न कोई लिखित बैनर होते, न तख्तियों के सहारे कोई अपनी भड़ास निकाल पाता। तब शायद आदमी बंदरों के किसी दल की तरह शोर मचाते। ऐसे में कोई ब्यान न दे पाता और न ब्यान पर बवाल होता न सियासत। ऐसे में अभिव्यक्ति की आज़ादी कौन बात करता और क्या बात करता? तब न कोई अखबार होता, न कोई साहित्य होता।  
शब्दों के बगैर दुनिया वास्तव में हमारी दुनिया अधूरी और निरस होती। सचमुच शब्द हमारी दुनिया को कई तरह के रंगों से भरते हैं। ये हमारी ज़िंदगी को नया आयाम देते हैं। शब्दों से हम समझते भी है और समझाते भी हैं। शब्द अपने आप में शक्ति हैं और किसी को भी शक्ति प्रदान करते हैं। ये शब्द आपकी भी शक्ति बन सकते हैं। कोई समझ ले तो एक शब्द भी जीवन बदल देता है, न समझो तो लाखों शब्द भी निरर्थक हैं। शब्द घाव भी देते हैं और घावों पर मरहम भी लगाते हैं। 
 शब्द आज़ाद है, पर उनका चुनाव करने के लिए आपको विवेकपूर्ण होना पड़ेगा। शब्द आप सुनते या पढ़ते ही नहीं, बल्कि वे एहसास दिलाते हैं। शब्दों की शक्ति असीम होती है। शब्द युद्ध और शान्ति दोनों करवाते हैं। कागज़ पर उतारे गए और मुंह बोले गये शब्द दुनिया में उथल पुथल मचा सकते हैं। शब्द धरा पर नहीं, दिलों पर पड़ते हैं और फ़िर बीज बन जाते हैं जिससे महाभारत जैसे युद्ध के भयानक वृक्ष भी अंकुरित हो सकते हैं या फ़िर विश्वशांति के पौधे। शब्द विध्वंसक परमाणु बम भी बन सकते हैं या पीड़ा से मुक्ति और मन को शीतलता देने वाली औषधि भी ।
 बहुत नासमझ होते हैं वो जो कहते हैं - शब्दों में क्या रखा है? इतिहास गवाह है कि दुनिया को दिशा देने वाले वही लोग थे जो शब्दों की अहमियत को समझते थे। अच्छे शब्द बहुमूल्य होते हैं और उनके इस्तेमाल में कोई खर्च नहीं आता। शब्दों के चयन में की गयी चंद लम्हों की गलतियों के कारण सदियों पछताना पड़ता है। ज़ुबान में हड्डी नहीं, परन्तु इससे उगले हुए शब्दों के तीर दिल को भेद कर रख देते हैं। इसलिए शब्दों का सोच समझ कर इस्तेमाल कीजिए। कहा भी है - ख़ुदा को पसंद नहीं सख्तियां ज़ुबान की, इसलिए हड्डी नहीं ज़ुबान की।

किसानों को कृषि उत्पाद बेचने की खुली आजादी देंगे कृषि सुधार कानून

 किसानों को कृषि उत्पाद बेचने की खुली आजादी देंगे कृषि सुधार कानून

 

डॉ मामराज पुंडीर

राजनितिक शास्त्र प्रवक्ता 

9418890000

mamraj.pundir@rediffmail.com


 


आज विश्व को इन्सान से इन्सान को टच करने से फेलने वाली महामारी ने जकड़ रखा है ।इसलिए भारतीय संस्कृति का प्रतीक नमस्ते को अपनाने के लिए पूरा संसार मजबूर हो गया है और hi और bye जेसी दक्षिणी सोच से भी छुटकारा मिल गया है । परन्तु वर्तमान स्तर के दौरान कृषि के क्षेत्र मे जो बदलाव आयेंगे उनसे दलालों की भूमिका निभाने वाले कुछ दलालों को जरुर बाय मिल जायेगा । इस विषय पर राजनीती भी शुरू हो गई है और क्यों न हो, आखिर वोट बैंक जो खिसक जायेगा । लोकतंत्र खतरे मे है । किसान आतम हत्या करेगा, पूंजीवादी लोग राज करेंगे, जैसे नारों का लगना अब शुरू होगा ।

परन्तु मेरा प्रशन इन राजनितिक पार्टियों से है कि जिसमे कांग्रेस सहित यूँ कहिये मोदी विरोधी सभी पार्टियां आती है । क्या आप लोग सच मे किसानों के साथ है या आपका वोट बैंक खिसक गया है । आप जबाब नही डोज, जनता भी सचाई से वाकिफ है तभी आप सत्ता से बाहर हो और हालात आगे भी अच्छे नही ।

मोदी सरकार बनने के बाद देश की जनता को कुछ क्रन्तिकारी फैसलों की उम्मीद जागी और जागती भी क्यों न , किसानों से सबंधित बिल तो कांग्रेस के मेनिफेस्टो में भी था । बस आपके पीला से गेंद हडप ली है । अब सिर्फ आप लोग चिल्लाह सकते है । आखिर ऐसा क्या है इस बिल में जिसे केंद्रीय सरकार ने लोकसभ के साथ साथ राज्य सभा मे भी पास करवा दिया है । भल्ले ही शिरोमणि अकाली दल ने साथ छोड़ दिया हो । 

केन्द्र की मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी में आखिरकार किसानों को उपज बेचने की आजादी दी है, संविदा खेती का अवसर दिया है। कल लोकसभा में और अब राज्यसभा मे कृषि सुधार के लिए पास हुए दोनों विधेयक किसानों को हक देते हैं कि वे अपनी उपज चाहे मंडी, बाजार जहां चाहें बेचें। इन बिलों को किसानों की समृद्धि का कारक बताते हुए केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने लोकसभा में साफ कर दिया है कि अब वक्त आ गया है कि देश के अन्नदाता किसानों को वाजिब मूल्य हर स्थिति में मिले। श्री तोमर ने लोकसभा के पटल से देश के किसानों को आश्वस्त कर दिया है कि उपज की सरकारी खरीदी व न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी था, जारी है और इस बिल के बाद पूर्व की तरह जारी रहेगा। बिल को ऐतिहासिक बताते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी ट्वीट किया है कि यह बिल किसानों को बिचौलियों से मुक्ति देने वाला है। यह देश के किसानों के लिए ऐतिहासिक क्षण है। असल में यह बिल किसानों को विक्रय के और अधिक विकल्प देकर उनको और अधिक सशक्त करेगा।कोरोना संकट के दौरान कृषि सुधार के लिए कल लोकसभा में पास हुए कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य संवर्धन और सरलीकरण विधेयक 2020 और कृषक सशक्तिरण और संरक्षण कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 देश भर में चर्चा में हैं।  इन्हें कृषि सुधार की दिशा में मोदी सरकार का क्रांतिकारी कदम बताया जा रहा है। इन्हें किसानों को आर्थिक मजबूती देने वाला बड़ा कदम बताया जा रहा है। असल में 2014 में सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार तेजी से काम कर रही है। इन विधेयकों पर कल बहस में कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा कि 2014 से मोदीजी के नेतृत्व में गांव, गरीब एवं किसान आगे बढ़े हैं। यूपीए सरकार के समय में में 12 हजार करोड़ का कृषि बजट था जबकि मोदी सरकार ने खेती और किसानों की परवाह करते हुए इसे बढ़ाकर  1 लाख 34 हजार करोड़ का कृषि बजट कर दिया है। हमारी सरकार ने किसानों के खाते में 75 हजार करोड़ दिए। हमने पीएम किसान योजना के जरिए आय संहिता योजना प्रारंभ की और किसानो के खाते में 92 हजार करोड़ रुपए डीवीडी के जरिए किसानों के खाते में जमा कराए हैं। कृषि मंत्री श्री तोमर ने बताया कि किस कदर एफपीओ के जरिए किसानों की उन्नति व समृद्धि का मार्ग तैयार किया जा रहा है। हमने 10 हजार एफपीओ मंजूर किए हैं ताकि उन्हें तकनीकी सहयोग मिल सके। ये एफपीओ 6 हजार 850 करोड़ रुपए की लागत से तैयार किए जा रहे हैं।  मोदी सरकार किसानों को कर्ज देने में भी आगे है। यूपीए ने जहां 8 लाख करोड़ किसानों के कर्ज के लिए दिए थे वहीं मोदीजी ने किसानों के लिए कर्ज दुगुना करते हुए 15 लाख करोड़ मंजूर किए हैं।श्री तोमर ने बताया कि हम जानते हैं कि कोरोना के कारण किसानों के सामने किस तरह के संकट हैं। हमारी सरकार ने आत्मनिर्भर पैकेज के तहत कृषि अधोसंरचना के लिए 1 लाख करोड़ रुपए दिए साथ ही 1128 करोड़ रुपए देश भर में सहकारी समितियों को भी दिए।श्री तोमर ने इन उदाहरणों से साफ कर दिया कि मोदी सरकार ने यह पैसा कोरोना संकट के समय एक माह के अंदर फैसला करते हुए दिया इससे सरकार की संवेदनशीलता स्पष्ट है।वे कहते हैं सरकार निरंतर प्रतिबद्ध है कि बुआई का रकबा, उत्पादन, जैविक खेती बढ़े।अपनी बात रखते हुए कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने साफ किया कि मोदी सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के प्रति वचनबद्ध है और इस सरकार ने समर्थन मूल्य को डेढ़ गुना बढ़ाकर इसका प्रमाण भी दिया है। श्री तोमर ने यूपीए सरकार को उलाहना देते हुए कहा कि कृषि विशेषज्ञ स्वामीनाथन की  कृषि संबंधी रिपोर्ट मंजूर करने में दस साल के कार्यकाल के बाबजूद यूपीए सरकार पीछे रही जबकि मोदी सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को मंजूर करते हुए किसानों को राहत दी। हम मूल्य आश्वासन बिल इसलिए लेकर आए ताकि देश के 86 प्रतिशत छोटे किसानों को भी निवेश का मौका मिले। उनके सामने भी प्रोसेसर, स्टार्टअप के अवसर आएं। इसके लिए किसान और करारकर्ता छोटे छोटे रकबे जोड़कर बड़े क्षेत्र की खेती कर सकते हैं जिससे करारकर्ता और किसान एक दूसरे की आमदनी बढ़ाने में सहभागी होंगे। यह करार किसानों के हक की पहले और मजबूत बात करेगा। उसकी देनदारी कभी भी उसकी जमीन पर नहीं आएगी और न ही उस पर किसी तरह का जुर्माना लगेगा। इसके विपरीत करारकर्ता और व्यापारी अपना दायित्व पूरा न करने पर जुर्माना भरेंगे। लोकसभा में मूल्य आश्वासन बिल की खूबियां बताते हुए कृषि मंत्री ने कांग्रेस के घोषणा पत्र का पेजवार हवाला देते हुए बिल के विरोध करने वालों पर सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने साफ किया कि इस बिल से संबंधित सुधार जब आपने अपने घोषणा पत्र में शामिल कर रखे थे तो आज सदन में आप इसका विरोध करके अपने संकल्प से क्यों पीछे हट रहे हैं। हम आज जो बिल लेकर आएं हैं वो देश में लायसेंसराज खत्म करेगा। किसान एक राज्य से दूसरे राज्य में उपने उत्पाद और उपज अधिक मुनाफे के लिए बेच सकेगा। ईप्लेटफार्म से किसानों की पहुंच बढ़ेगी। देश की 585 मंडियों में ईप्लेटफार्म के प्रति इतनी लोकप्रियता रही कि अब तक 35 हजार करोड़ रुपए का व्यापार इस पर हो चुका है। कृषि मंत्री तोमर ने साफ कर दिया कि यह बिल किसानों के हाथ खोलेगा, उसकी पहुंच बढ़ाएगा। उसे तीन दिन में उपज का पेमेंट दिलाएगा। किसान जब मनचाही जगह उपज बेचेगा तो उपज के खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, इसमें अधिक व्यापारी काम करेंगे जिससे निश्चित ही रोजगार के अवसरों में इजाफा होगा। लोकसभा में इस बहस के दौरान कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने स्वामीनाथ रिपोर्ट के साथ किसान नेता शरद जोशी की सिफारिशों का जिस तरह हवाला दिया वो उनकी बात को सदन में मजबूती देने वाला रहा। श्री तोमर ने बताया कि किन किन बातों को लेकर संघर्षशील किसान नेता जोशी जी लड़ते रहे थे और उन सारी मांगों को ये दोनों विधेयक निर्णायक ढंग से पूरा करने वाले हैं। कुल मिलाकर मोदी सरकार के इन कृषि सुधारों विधेयकों पर कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने जिस गहराई से अपनी बात रखी उससे उनकी गांव के जमीनी किसान नेता व किसानपुत्र छवि सदन में फिर एक बार स्थापित हुई। वे सदन को कृषि मंत्री और एक किसान दोनों रुपों में समझाते दिखे। आसान शब्दों में तर्कपूर्ण जवाबों के साथ विधेयक का पास होना तोमर की निर्णायक सफलता रही। अब देखना ये कि कितनी जल्दी यह विधेयक कानून बनकर देश के किसानों को उपज बेचने की आजादी के साथ उन्हें आर्थिक आत्मनिर्भरता देता है। तब तक निश्चित ही देश के किसान इस विधेयक पर हो रही हर चर्चा पर निरंतर ध्यान लगाए रहेंगे।

वो यात्रा जो सफलता से अधिक संघर्ष बयाँ करती है उन्हें नरेन्द्र मोदी कहते है

 वो यात्रा जो सफलता से अधिक संघर्ष बयाँ करती है उन्हें नरेन्द्र मोदी कहते है 

 


डॉ मामराज पुंडीर

राजनितिक शास्त्र प्रवक्ता 

9418890000

mamraj.pundir@rediffmail.com

 




आज भारत विश्व में अपनी नई पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है। वो भारत जो कल तक गाँधी का भारत था जिसकी पहचान उसकी सहनशीलता थी, आज मोदी का भारत है जो खुद पहल करता नहीं, किसी को छेड़ता नहीं लेकिन अगर कोई उसे छेड़े तो छोड़ता भी नहीं। गाँधी के भारत से शायद ही किसी ने सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक जैसे प्रतिउत्तर की अपेक्षा की होगी। उसके बाद अब डोकलाम विवाद और फिर गलवान घाटी में चीन को अपने जवाब से भारत ने विश्व में अपनी इस बदली हुई पहचान की मुहर लगा दी है। उससे बड़ी बात यह है भारत की इस नई पहचान को विश्व बिरादरी सहजता के साथ स्वीकार भी कर चुकी है। जो की वैश्विक राजनीति में भारत की कूटनीतिक एवं रणनीतिक विजय की परिचायक है।भारत की यह नई पहचान इसलिए भी विशेष हो जाती है क्योंकि उसे यह पहचान दी है एक ऐसे नेता ने जिसके जीवन की शुरुआत बेहद साधारण रही। जिसका जन्म किसी राजनैतिक परिवार में नहीं हुआ। जिसका केवल बचपन ही नहीं पूरा राजनैतिक जीवन ही संघर्षपूर्ण रहा। एक चाय वाले से एक प्रचारक, एक प्रचारक से एक मुख्यमंत्री और एक मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बनने तक का उनका यह सफर बहुतों के लिए प्रेरणादायक है खास तौर पर युवाओं के लिए। शायद वो भी अपनी इस ताकत को जानते हैं इसलिए भले ही अपनी वर्तमान योजनाओं के केंद्र में वो गरीबों और वंचितों को रखें लेकिन उनकी भविष्य की योजनाओं का केंद्र तो देश के युवा ही होते हैं। युवाओं और बच्चों से साल भर वो भिन्न भिन्न माध्यमों से जुड़े रहते हैं। चाहे परीक्षा पे चर्चा हो या चंद्रयान छोड़े जाने के कार्यक्रम में बच्चों की भागीदारी। इन बच्चों में वो देश का भविष्य देखते हैं तो इन बच्चों को उनमें अपना एक अभिभावक नज़र आता है। यही कारण है कि देश की नई शिक्षा नीति के जरिए मोदी इन बच्चों में छुपे वैज्ञानिक और इंजीनियर ही नहीं बल्कि इनमें छुपे चित्रकार और गीतकार को भी जगाना चाहते हैं। ताकि वे जितनी गहराई से विषय को समझें उतनी ही शिद्दत से मानवीय संवेदनाओं को भी महसूस करें। क्योंकि वो जानते हैं कि भारत को आज जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है उन सब का मूल भ्रष्टाचार है और भ्रष्टाचार का मूल दूसरों के अधिकारों तथा अपने दायित्वों के प्रति संवेदनहीनता है। शायद इसलिए एक तरफ वो युवा आईएएस अधिकारियों एवं पुलिस कर्मियों से व्यक्तिगत संवाद करके उन्हें आमजन के प्रति अपने कर्तव्यों का एहसास कराते हैं तो दूसरी तरफ “मन की बात” से आम जनता से रूबरू होकर उन्हें देश और देशवासियों के प्रति उनके दायित्वों का बोध कराते हैं। विशेष बात यह है कि उनकी इन साधारण सी लगने वाली महत्वपूर्ण बातों को  देशभर के लोगों का भारी समर्थन देखने को भी मिलता है। चाहे नोटबन्दी हो या स्वच्छता अभियान। राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें मिलने वाले समर्थन के आगे विपक्ष का राजनैतिक विरोध ध्वस्त हो जाता है। कोरोना काल में जनता कर्फ्यू से लेकर उनकी एक अपील पर देश भर में घंटियों की गूंज ने विश्व के शक्तिशाली से शक्तिशाली नेताओं की नींद उड़ा दी। यही कारण है कि चाहे विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमरीका के राष्ट्रपति हों वो चुनावों से पहले अमेरिका में बसे भारतीयों को आकर्षित करने के लिए “हाऊडी मोदी” कार्यक्रम करवाते हैं तो इस्रायल जैसे देश के राष्ट्रपति चुनावों से पहले मोदी के साथ अपनी मित्रता के बैनर लगवाते हैं।

कोरोना जैसी महामारी जिसने यूरोप के विकसित देशों से लेकर अमेरिका तक को हिला दिया वहाँ भारत के गांव गांव तक कोरोना से बचने के लिए मास्क का उपयोग और हाथ धोने को लेकर आमजन की जागरूकता देखते ही बनती है। कोरोना से भारत जैसा गरीब देश इस प्रकार से लड़ लेगा इसकी विश्व में किसी ने अपेक्षा नहीं की थी। ऐसा लगता है कि इतनी सहजता और सरलता से असंभव को संभव बनाने में मोदी को जैसे महारथ हासिल है। तभी तो संविधान से धारा 370 का हटना हो या राम मंदिर का ऐतिहासिक फैसला ,सरकार के इन कदमों से नरेंद्र मोदी ने देशवासियों के दिलों में वो जगह बना ली जो कल्पना से परे है। वडनगर के एक साधारण से स्कूल से शिक्षा अर्जित करने वाला विद्यार्थी विदेशों के बड़े बड़े विश्वविद्यालयों से बड़ी बड़ी डिग्री धारी नेताओं के लिए इतनी लंबी लकीर खींच देगा किसने सोचा था। राजनैतिक  परिवार में पैदा होने वाले एवं राजनैतिक वातावरण में पलकर बड़े होने वाले ऐसे नेता जो राजनीति में टिके रहने के लिए  इसे ही अपनी सबसे बड़ी शक्ति मानते थे उनके लिए नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्तित्व का प्रधानमंत्री बनना एक सबक है।

खुद  मोदी के शब्दों में, मैं मुख्यमंत्री बनने से पहले मुख्यमंत्री के दफ्तर नहीं गया। मैं सांसद बनने से पहले संसद भवन नहीं गया। और प्रधानमंत्री बनने से पहले प्रधानमंत्री कार्यालय नहीं गया।

जब ऐसा नेता मुख्यमंत्री बनता है और तमाम राजनैतिक विरोध के बावजूद भारी जनसमर्थन से लगातार तीन चुनाव जीतता है। यह नेता जब बना सके।”चौकीदार चोर है के नारों के बावजूद पहली बार से भी अधिक बहुमत से प्रधानमंत्री बनता है तो यह यात्रा उसकी सफलता से अधिक उसके संघर्ष को बयान करती है। वो संघर्ष जो उनके व्यक्तित्व को बयान करता है। वो व्यक्तित्व जो इन शब्दों से परिभाषित होता है कि “एक सफल व्यक्ति वह है जो औरों द्वारा अपने ऊपर फेंके गए ईंटों से एक मजबूत नींव रख कर समाज और देश का निर्माण करते है।

भारतीय जनता पार्टी की सरकार भी इस मजबूत राष्ट्र प्रेमी के आस पास घुमती है । राज्य की जनता भी अपने नेताओं में मोदी जी को देखकर अपना मत देता है । हाल ही मे मोदी जी ने उनको सम्मान स्वरूप दिए गिफ्ट की नीलामी कर 103 करोड़ की राशी देश के जरूरत मंद लोगो को दान की । यह पहली बार नही हुआ, अपितु जब भी राष्ट्र को जरूरत होती है मोदी जी का हमेशा एक सिपाही की तरह आगे वाली पंक्ति में खड़े होते है । कहते है लोग स्वामी विवेकानन्द के साथ साथ मोदी जी को राम राज्य के संस्थापक के रूप में जनता देखती है ।


हिंदुस्तान की जनता हमेशा इस नेता को सलाम करती रहेगी

अभिनन्दनीय है-अभिनन्दन ग्रन्थ -- आचार्य ओमप्रकाश 'राही'

अनेक पत्र-पत्रिकाओं तथा पुस्तकों का सम्पादन कर चुके उच्च कोटि के साहित्यकार डा.प्रेमलाल गौतम के सम्पादन में बहुमुखी प्रतिभा के धनी तथा बहुआयामी व्यक्तित्व विभूषित ज्योतिर्विद् एवं समाजसेवी श्रीयुत स्वाधीन चन्द्र गौड के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को लेकर तैयार किये गये 'अभिनन्दन ग्रन्थ' की प्रति हस्तगत हुई तो एक दूरदर्शी तथा गम्भीर मुद्रा में 'अभिनन्दनीय' के प्रभावी चित्र से विभूषित मुखपृष्ठ ने बेहद प्रभावित किया ।
      सूक्ष्मेक्षिकया देखने पर जहाँ प्रथम अध्याय में वैदुष्य पूर्ण सम्पादकीय के साथ स्वामी दीनबन्धु दास, प्रो.मनसाराम अरुण, प्रवीणचन्द्र गौड,लक्ष्मण प्रसाद शर्मा आदि के 'आशीर्वचन' एवं साहित्यकार डा.मुरलीधर पाण्डेय तथा प्रो.दिनेश चमोला शैलेश जैसे विद्वानों की 'शुभाशंसा' से मन गदगद हो जाता है वहीं दूसरे अध्याय में राष्ट्रपति सम्मानित अभिनवकालिदास महामहोपाध्याय प्रो.केशवराम शर्मा का 'अभिनन्दनम्' संस्कृत आशुकवि डा.मनोहरलाल आर्य का 'श्री स्वाधीनचन्द्र गौडो विजयताम्' तथा हिमाचल संस्कृत अकादमी के पूर्व सचिव डा. हरिदत्त शर्मा का 'पुण्यात्मकं पालय' संस्कृत पद्यावली में किया गया चित्रण बेहद प्रभावशाली है ।
        पूर्व प्राचार्य डा. रामदत्त शर्मा ने अपने आलेख में गौड साहिब की श्रेष्ठ एवं प्रभावी वक्तृता को उनके प्रवचनों से ही सोदाहरण प्रस्तुत किया है । हिमाचल कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी के पूर्व सचिव डा. जगदीश शर्मा ने गौड साहिब की दिव्य दृष्टि का स्वानुभूत तथ्यों के आधार पर प्रदर्शन किया है जो वास्तव में आश्चर्यजनक है । के. सी. वालिया ने अपने आलेख में सप्रमाण प्रतिपादित किया है कि गौड जी सच्चे अर्थों में 'विलक्षण प्रतिभा के धनी' रहे हैं जबकि पूजा ढिल्लों ने 'मेरे पथ प्रदर्शक श्रद्धेय गुरुदेव' मानकर अपनी हर समस्या का निवारक सिद्ध किया है । वृजभूषण शर्मा ने भी स्मृतियों को साझा करते हुए गौड साहिब के अलौकिक गुणों का वर्णन किया है जबकि शारदा देवी की गुरु के प्रति श्रद्धा व कृतज्ञता भी पठनीय एवं मननीय है और अजय मेहता (पृष्ठ 82) द्वारा गुरु शीश के साथ 'दिव्य प्रकाश' के दर्शन करना गौड जी की दिव्यता दर्शाता है ।
   उपनिषदों, पुराणों तथा नीति ग्रन्थों से उद्धरण पूर्वक पूर्व प्राचार्य डा. केशवानंद कौशल ने गौड साहिब की जीवनशैली व कार्य प्रणाली से प्रभावित होकर मननीय प्रश्न उपस्थापित किया है "---निजहृदि विकसन्त:सन्ति सन्त: कियन्त:" ? पूर्व जिला भाषा अधिकारी सीताराम ठाकुर ने 'विराट व्यक्तित्व के धनी : श्रीयुत स्वाधीनचन्द्र गौड' के अथक प्रयासों की चर्चा करते हुए जिस तरह 1998 से प्रारम्भ हुई 'कल्याणी' पत्रिका के सभी नौ अंकों में प्रकाशित 'मुख्य संरक्षक की कलम से' निकले शब्दों तथा उनके आलेखों का परिचय दिया है उससे पत्रिका की उपादेयता भी स्वयं सिद्ध हो रही है ।
               इसी क्रम में गौड जी को विभिन्न लेखकों की विचारधाराओं को इस 'अभिनन्दन ग्रन्थ' में संकलित किया गया है । ऋषिपाल शर्मा इन्हें 'अभिन्न मित्र और सहपाठी' मानते हैं तो गिरीश दीक्षित 'आदर्श शिक्षक'। नवनीत शर्मा को ये 'महामानव' नजर आते हैं जबकि सुचेता शर्मा को 'युगपुरुष' । गावर सिंह नेगी इन्हें अपना 'प्रेरणास्रोत' मानते हैं और अमरदेव आंगिरस 'सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षक' ।अजय मेहता ने इन्हें 'सद्गुरुदेव' कहा है  जबकि पवन गुप्ता ने 'महान् वटवृक्ष की दुर्लभ छाया' । रीता कपूर इन्हें 'जीवन आदर्श' मानती हैं और सुनील कुमार मिश्र 'एक आकर्षक व्यक्तित्व' । भीमसिंह चौहान इन्हें 'शालीनता की प्रतिमूर्ति' बताते हैं तथा योगराज जोग 'सनातन धर्म का सच्चा सिपाही' ।
      पश्चिम मुम्बई से पटकथा लेखक निम्मी एवं वागीश धमीजा की 'गुरु महिमा अपरम्पार' के ये शब्द बहुत प्रभावशाली जान पड़ते हैं :---- "इस जन्म में तो कोई ऐसा कार्य याद नहीं आता,मगर पिछले जन्म में जरूर कोई अच्छा कर्म रहा होगा जिससे स्वाधीनचन्द्र गौड जैसे सच्चे गुरु से मिलना सम्भव हो पाया"। 
       राजस्थान से डा.उर्मि माली के छन्दोबद्ध 65 पद्यों में  जहाँ 'धन्या सनातन सभा रबौण' पठनीय एवं मननीय है वहीं नीलम चौहान की 'महामानव' डा.मस्तराम शर्मा की 'सनातन का महावृक्ष' के.सी.वालिया की 'क्या गजब हो तुम' सुरेश शर्मा की 'गुरुदेव' तथा योगेन्द्र शर्मा की 'मन्दिर स्थापना दिवस' कविताएँ भी प्रभावशाली बन पड़ी हैं ।
      पोर्टलैंड, अमेरिका से डा.हर्षिता ढिल्लों के THE REFLECTION OF GOD उच्च न्यायालय शिमला के अधिवक्ता जनेश्वर के OUR GUIDING LIGHT भरत बी कक्कड़ के RESPECTED GAYR JI तथा राजीव शांडिल के GAUR SAHIB विचार भी गहनता से गौड साहिब के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं ।
         इन सबके साथ गौड साहिब के 'वंशवृक्ष' की पाँच पीढियों का समग्रता से चित्रण करते सम्पादकीय दायित्व को बखूबी निभाते डा.प्रेमलाल गौतम के 50 पृष्ठीय आलेख या कहें लघु पुस्तक में 'समाजसेवी ज्योतिर्विद् श्रीयुत स्वाधीनचन्द्र गौड का समग्र व्यक्तित्व एवं कृतित्व' पाठकों को गौड साहिब के अध्ययन-अध्यापन, जीवन संघर्ष,जप-तप,आराधना-साधना और ऋद्धि-सिद्धि के साथ उनके साथ हुई चमत्कार पूर्ण घटनाओं का वर्णन उनके समूचे जीवन से बखूबी परिचित कराता है और सचमुच किसी महामानव से मिलने का अहसास कराता है ।
      एतदनन्तर स्कन्द पुराण के अन्तर्गत आने वाली  'श्रीगुरुगीता' का संकलन भी सामयिक एवं प्रासंगिक बन पड़ा है ।
     तृतीय अध्याय में 'पुस्तक एवं पत्र-पत्रिकाओं के गवाक्ष से' कुछ देखने का अवसर प्राप्त होता है जबकि चतुर्थ अध्याय 'गौड' साहब की 'प्रशस्ति एवं सम्मान' से भरा पड़ा है । हमें इस बात की प्रसन्नता है कि हमारी संस्था 'हि.प्र.सिरमौर कला संगम' भी माननीय गौड साहब को 2017 में अपने राष्ट्र स्तरीय अलंकरण समारोह में अलंकृत करने का अवसर प्राप्त कर चुकी है जिसका प्रशस्ति पत्र भी यहाँ संकलित है । पंचम एवं अंतिम अध्याय मुँह बोलती तस्वीरों की 'चित्रावली' से सुसज्जित है ।
          नि:संदेह 272 पृष्ठों के विस्तृत फलक पर आस्तीर्ण इस अभिनन्दनीय 'अभिनन्दन ग्रन्थ' को प्रस्तुत करने के लिए सम्पादक डा.प्रेमलाल गौतम के साथ 'शिष्य मण्डल, गुरुकुल ब्रजधाम, रबौण,सोलन' बधाई का पात्र है । अभिनन्दन अभिनन्दन अभिनन्दन 

संस्मरण - श्री सुरेश भारद्वाज, शिक्षा मंत्री हिमाचल प्रदेश


मेरे विद्यार्थी जीवन की बात है। एक बार बरसात की छुट्टियां खत्म हुईं। स्कूल सोमवार से शुरू होना था। रोहड़ू क्षेत्र का सबसे बहुत पुराना स्कूल है..पढाल। फिर पता चला कि शनिवार से ही शुरू हो जाएगा। मुझे लगा कि गृह कार्य जिन कॉपियों में किया है, उन्हें सोमवार को स्कूल ले जाऊंगा। सो शनिवार को बिना गृह कार्य के ही स्कूल पहुंच गया। अध्यापक गोबिंद राम झिंगटा जी ने कड़क आवाज में कहा, 'लाओ सुरेश! गृहकार्य दिखाओ। मैंने खड़े होकर कहा कि सोमवार को ले आऊंगा। उसके बाद वह मेरे करीब आए और पूरी ताकत के साथ मुझे एक थप्पड़ पड़ा।

थप्पड़ क्या था...यूं समझिए कि पांचों अंगुलियां मेरी गाल पर छप गईं। फिर तो आदत बना ली कि जो काम जिस दिन होना है, वह उसी दिन होना है। उसे लंबित रखने का कोई मतलब नहीं है। यह थे झिंगटा जी, जिनका मेरे जीवन और मेरी कार्यशैली पर अब तक प्रभाव है।

मेरे पिता जी नौकरीपेशा आदमी थे, इसलिए जहां उनका तबादला होता वहां मैं भी चला जाता था। जीवन में जितने अध्यापक आए, सब एक से बढ़ कर एक लेकिन जिनसे सबसे अधिक प्रभावित हुआ, उनमें एक ंिझंगटा जी थे और दूसरे थे प्रोफेसर श्यामसुंदर जी। बॉटनी पढ़ाते थे। कॉलेज था शिमला का सनातन धर्म भार्गव कॉलेज। वह पंजाब विश्वविद्यालय से नए-नए एमएससी करके आए थे। बेहद ज्ञानवान। उनकी बातें विद्यार्थियों के मन में सीधे उतर जाती थी। बाद में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में वह अध्यक्ष हुए और मैं मंत्री। उन्होंने जीवन के प्रति दृष्टि के जो आयाम जोड़े, वे अब भी साथ देते हैं। बाद में वह सत्य साई बाबा के भक्त हो गए थे।
मेरी  हायर सेकेंडरी घुमारवीं स्कूल से 1968 में हुई। उसके बाद मैं प्री मेडिकल के लिए जालंधर चला गया। फिर बीएससी शिमला से की। उसके बाद कानून की पढ़ाई की। इन सभी स्थानों पर कई अच्छे अध्यापक मिले।

गुरु और शिष्य का संबंध संसार का एकमात्र ऐसा संबंध है जहां एक चाहता है कि मैं अपना सारा ज्ञान दूसरे को दे दूं और उसका जीवन संवार दूं। आज जो हूं, केवल अपने अध्यापकों के कारण। सबको मेरा नमन पहुंचे। 

साभार   दैनिक जागरण 

हिमाचल में शतरंज की संभावनाएं-- हंस राज ठाकुर


विद्यार्थी के सर्वागीण विकास हेतु शिक्षा के साथ खेलें भी परमावश्यक हैं I हर खेल का अपना महत्त्व है व विद्यार्थी अपनी रूचि व कौशल के हिसाब से खेल का चयन करता है I वर्तमान स्कूली शिक्षा में लगभग सारे खेल विद्यार्थी के शारीरिक विकास के साथ जुड़े हैं – यहाँ बात करेंगे मानसिक संवर्धन से जुड़े खेल शतरंज की I 

'शतरंज एक ऐसा खेल – नहीं है कोई जिसका मेल'

विश्वनाथन आनंद का नाम कौन नहीं जानता- पांच बार का विश्व चैंपियन वो भी अलग अलग फॉर्मेट में I हमारे देश के प्रधानमंत्री मोदी जी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे उन्होने शतरंज की खूबसूरती को पहचाना व देश के हर नागरिक के लिए इसे खेलना जरुरी बताया – उन्होने शतरंज को सौ दुखों के एक हल के रूप में परिभाषित किया I परिणामस्वरूप नयी शिक्षा नीति में भी शतरंज को तवज्जो मिली और हिमाचल प्रदेश सरकार ने अपने सौ दिन के एजेंडे में शतरंज, योग व संगीत को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने को मंजूरी दी I सौभाग्यवश, पिछले दो सालों में ही सरकार के इस मिशन को शिक्षा विभाग व प्रदेश के शतरंज प्रेमियों ने पहली से बाहरवीं कक्षा तक इसे स्कूली खेलों का अनिवार्य हिस्सा बना डाला I आज हिमाचल प्रदेश देश का ऐसा राज्य बन गया है जहाँ खेलों के साथ इसे स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा भी बनाया जा रहा है व इस दिशा में विकास के मामले में गुजरात , तमिलनाडु से अग्रणी नजर आ रहा है जो अपने आप में एक मिसाल  है I 

तत्कालीन शिक्षा सचिव हिमाचल सरकार ने दिसम्बर 2018 में संयुक्त निदेशक प्रारम्भिक शिक्षा की अध्यक्षता में राज्य शिक्षा कौंसिल सोलन की सहभागिता से प्रदेश शतरंज पाठ्यक्रम समिति का गठन किया, जिसमे प्रदेश के शतरंज प्रेमी शिक्षक भी सदस्य हैं I शिक्षक व शतरंज प्रेमी सदस्यों के सहयोग से यह कार्य जल्दी संपन्न कर लिया गया व पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने व आगामी क्रियान्वयन हेतु राज्य शिक्षा कौंसिल सोलन के पास विचाराधीन है I सरकार के एजेंडे के अनुसार बहुत जल्द प्रदेश के सरकारी स्कूलों में चैस क्लब भी देखने को मिल सकते हैं I 

शतरंज -मानसिक संवर्धन के साथ साथ विविधता का खेल है , जिसे प्रकृति भी बाधित नहीं कर सकती ,ऐसा खेल जिसे दस वर्ष का खिलाडी भी सौ वर्ष के खिलाडी के साथ खेल सकता है -जो किसी भी समय , किसी भी मौसम और किसी भी हालत में कहीं पर भी खेला जा सकता है वो भी बहुत कम खर्चे पर I वार्षिक स्कूली खेल प्रतियोगिता के दौरान बरसात में जहाँ सब मैदानी क्रीड़ायें बंद हो जाती हैं , शतरंज का खेल कमरों में भी निर्वधित जारी रहता है I सभी सरकारी विद्यालयों में माकूल खेल संसाधन भी उपलब्ध नहीं है I 

शतरंज के खेल में प्रदेश से अभी तक कोई भी खिलाडी चैस मास्टर ,फीडे मास्टर ,इंटरनेशनल मास्टर या ग्रैंड मास्टर नहीं बन पाया है क्योंकि इस छोटे से प्रदेश में सशक्त शतरंज संघ नहीं होने की वजह से ओपन स्पर्धाओं में भी कोचिंग संस्थान व प्रशिक्षण के अभाव में खिलाडी ज्यादा बेहतर नहीं कर पाए और आज तक विश्व शतरंज पटल पर कोई हिमाचली अपना रंग नहीं जमा पाया I 

पिछले दो सालों में डी.एम.सी.ए जैसे शतरंज संगठनों के चलते हिमाचल प्रदेश में शतरंज की बयार देखने को मिली है -प्रदेश सरकारी स्कूलों के बच्चों में इस खेल की बढती लोकप्रियता के साथ साथ आज लॉकडाउन जैसी परिस्थिति में जहाँ सब खेल बंद पड़े हैं , शतरंज निर्बाध रूप से ऑनलाइन प्रतियोगिताओं के रूप में आयोजित की जा रही है I यहाँ तक की इस संकट काल में शतरंज खिलाडी इस ऑनलाइन खेल से कोरोना फाइटर की मदद हेतु प्रदेश में सहयोग राशी जुटा पाये हैं I इस खेल की क्षमता से सरकार भी वाकिफ़ है I प्रदेश के शतरंज प्रेमियों को यह भी इंतजार है कि इस बार से शतरंज को अनिवार्य रूप से 19 वर्ष से कम आयु वर्ग के खिलाडियों के लिए भी नियमित रूप से लागू किया जाये -पिछले वर्ष इस वर्ग के ट्रायल में प्रदेश के 11 जिलों से लगभग 100 खिलाडियों ने भाग लिया था I 

आज प्रदेश में शतरंज प्रतिभाएं उभर रहीं हैं और विश्व भर में हुए अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि शतरंज खेलने वाले बच्चे अक्सर पढाई में भी अव्वल होते हैं I पिछले वर्ष , अप्रैल माह में मतदाता जागरूकता हेतु चुनाव आयोग की अनुमति से दो हिमाचली प्रतिभाओं हितेश आजाद व हँस राज ठाकुर ने चैस मैराथन का अनोखा विश्व कीर्तिमान बनाया I आज प्रदेश के गाँव गाँव तक स्कूलों के माध्यम से यह खेल लोकप्रिय बन रहा है जबकि योग व संगीत अभी तक दूर की कौड़ी नजर आ रहे हैं I सरकार को शतरंज के क्षेत्र में मानव संसाधन विकसित करने के साथ प्रत्येक जिला स्तर पर खेल विभाग द्वारा संचालित चैस क्लब गठित करने होंगें ताकि उसमे जिला के हर आयु वर्ग के खिलाडी मिलकर युवाओं को इस खेल में और अधिक सशक्त बना सके – प्रदेश को इंटरनेशनल मास्टर स्तर के कोच भी जुटाने होंगे तभी इस नयी पौध को सही दिशा दे पाने में हम कामयाब होंगे I आज कोविड 19 के इस मुस्किल दौर में भी यदि सरकार व शिक्षा विभाग चाहे तो प्रदेश में स्कूली स्तर पर भी घर बैठे बच्चों की ऑनलाइन शतरंज प्रतियोगिताएं आयोजित करवायी जा सकती हैं I              

अवधारणा या हकीकत – दोहरी पेंशन व्यवस्था -- हंस राज ठाकुर

एक आम अवधारणा है कि पेंशन बुढ़ापे का सहारा होती है I वर्तमान के साथ साथ , भविष्य की चिंता करना भी मानव का स्वभाव है I आज देश के लाखों कर्मचारी अपने व परिवार के भविष्य को लेकर चिंतित हैं I स्वभाविक भी है कि 30 -35 वर्षों तक सरकारी क्षेत्र में अपनी सेवा देने के पश्चात सेवानिवृति पर एक-दो हजार रुपए की पेंशन से परिवार व कर्मचारियों का बुढ़ापा सुरक्षित नहीं हो सकता I वर्तमान में देश का हर कर्मचारी अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहा है – मुद्दा है पुरानी पेंशन बहाली का I 

सी.सी.एस पेंशन रूल-1972, जो 1 जून 1972 से नियमित व सरकारी कर्मचारियों पर लागु होते हैं उनमें संसोधन करके दिसम्बर 2003 से पहले नियुक्त कर्मचारियों तक सीमित कर दिया I कुछ राज्यों में 14 मई 2003 से पहले नियुक्त कर्मचारियों तक I जबकि रेलवे कर्मचारियों , दिहाड़ीदार कर्मचारी , सी.पी.एफ कर्मचारी, या अनुबंध कर्मचारी पर लागु नहीं होते I पेंशन 58 वर्ष की उम्र पर सेवानिवृत होने पर नियमित कर्मचारी को दी जाती है I कर्मचारी एक ही तरह की सेवा या पोस्ट में रहते हुए- दो पेंशन प्राप्त नहीं कर सकता है I दूसरी तरफ माननीयों को एक ही तरह की देश सेवा में दो -तीन बार भी पेंशन का प्रावधान है I कर्मचारियों को सेवाकाल के दौरान यदि किसी अपराधिक मामले में सलिप्त पाया जाये तो पेंशन रोक दी जाती है – दूसरी तरफ माननीयों के खिलाफ़ यदि अपराधिक मामले भी दर्ज होते हैं तो भी पेंशन धारा प्रवाह जारी रहती है I यह दोहरी पेंशन व्यवस्था कर्मचारियों को ठगा सा महसूस करवाती है, एक देश में दो तरह की व्यवस्था क्यों ? क्या कर्मचारी इस देश के नागरिक नहीं , यदि हाँ तो 2003 के बाद चुने गए माननीय इस नई पेंशन व्यवस्था में क्यों नहीं I ऐसे दोहरे मापदंड पेंशन व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करते हैं I 

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पुरानी पेंशन बहाली देश के हर कर्मचारी की मांग है और अपनी इस मांग पर नेशनल मूवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम के अंतर्गत एकजुट हो खड़ा है I कई राज्यों में लॉकडाउन के चलते जहाँ अन्य गतिविधियाँ स्थगित हैं , नयी पेंशन स्कीम के कर्मचारियों द्वारा प्रधानमंत्री को पुराणी पेंशन बहाली बारे खून से पत्र लिखने की मुहिम जोर पकड़ने लगी है I 

एक जनवरी 2004 से देश में नई नेशनल पेंशन स्कीम लागु की गयी थी I इस तिथि के बाद केंद्र सरकार व राज्य सरकार में नौकरी पाने वाले कर्मचारियों को पुरानी पेंशन व्यवस्था से बाहर कर दिया गया I हिमाचल सहित कई राज्यों में यह व्यवस्था केंद्र से भी पहले 14 मई 2003 को लागू कर दी गई I 

हाल ही में केंद्र सरकार के उन कर्मचारियों के लिए राहत भरी ख़बर आयी कि 1 जनवरी 2004 से लेकर 28 अक्टूबर 2009 के बीच अपनी सर्विस बदली है अर्थात वे कर्मचारी जो इस अवधि के दौरान पुरानी सेवा छोड़कर किसी दुसरे विभाग में आ गए थे और इस वजह से वे पुरानी पेंशन व्यवस्था से बाहर हो गए थे , उन्हे पुरानी पेंशन व्यवस्था में शामिल कर दिया गया I 

आज भी हज़ारों मामले न्यायलयों में लंबित हैं जो वर्ष 2003 से पूर्व सेवा में नियुक्त हुए थे और 14 मई 2003 के बाद नियमित हुए I वर्तमान परिदृश्य में देश का हर कर्मचारी पुरानी पेंशन से वंचित है और पुरानी पेंशन बहाली की यह मांग आज देश में व्यापक स्तर पर होने लगी है I कर्मचारी अपना पूरा जीवन देश सेवा में लगा देता है और बुढ़ापे में अपने आप को असहाय महसूस करने लगा है, नयी नेशनल पेंशन स्कीम में लगे अपने पैसे को भी सुरक्षित नहीं पा रहा है, उसका यह पैसा जोखिमों के अधीन है I 

केंद्र सरकार ने सेवा के दौरान कर्मचारी की मृत्यु पर उसे पुरानी पेंशन का प्रावधान भी किया है, मगर कई राज्यों में यह भी अभी तक लागु नहीं हो पाया है I कर्मचारी सरकार की विकास योजनाओं को धरातल पर फलीभूत करने वाला सहयोगी होता है I नई नेशनल पेंशन स्कीम के तहत वर्तमान में जरुरत के समय पर जमा की गयी अपनी सम्पूर्ण धनराशी को निकलने की कोई व्यवस्था नहीं है I वर्तमान में कर्मचारियों के मूल वेतन व ग्रेड पे का 10% हिसा काटकर विभिन्न फण्ड मनेजरों के माध्यम से शेयर बाजार में लगाया जाता है I शेयर बाज़ार में लगाया यह करमचारियों का पैसा शेयर बाजार लुढकने के साथ ही लुढ़क जाता है , और कई बार तो मात्र 12 दिनों में कई एन.पी.एस खाता धारकों को 10000 से भी ज्यादा का आर्थिक नुक्सान उठाना पड़ा है,क्योंकि शेयर बाजार जोखिमों के अधीन रहता है और कर्मचारी अपने पैसे व् बुढ़ापे की सुरक्षा चाहता है I

पेंशन प्रणाली में आर्थिक सुरक्षा सभी कर्मचारियों की मांग है और जायज भी नज़र आती है I केंद्र व् राज्य सरकारों को कर्मचारियों की इस मांग पर चिंतन व् मनन करना होगा , क्योंकि सरकार का हिसा भी, कर्मचारी के हिस्से के बराबर इस नयी पेंशन स्कीम में जाता है यदि सरकार पुरानी पेंशन व्यवस्था लागु करती है तो जहाँ सरकार को अपना हिस्सा कर्मचारी को नहीं देना पड़ेगा ,वहीं कर्मचारी का पैसा भी सरकार के पास ही रहेगा , जो कर्मचारी की सेवानिवृति से पहले कई विकास योजनाओं में लगाया जा सकता है I दोहरी पेंशन व्यवस्था की कुंठा से भी कर्मचारी मुक्त हो पायेगा I सरकार के विकासात्मक कार्य भी और अधिक पकड पायेंगे I     

                    हंस राज ठाकुर गाँव व् डाकघर बग्गी जिला मंडी ( हि प्र )       

बेज़ुबान जीवों पर अत्याचार अमानवीय -- जगदीश बाली

ईश्वर ने इस संसार में रहने के लिए केवल मनुष्य को ही पैदा नहीं किया। इस पृथ्वी पर केवल मनुष्य का एकाधिकार नहीं है। सृष्टि के उस सर्जक ने इस प्रकृति को विभिन्न तरह के प्राणियों से अलंकृत किया है। उसने इस जहां को छोटे से छोटे और बड़े से बड़े जीवों से भरा है। इन सभी जीवों का इस पृथ्वी पर जीवित रहने का उतना ही हक है जितना मनुष्य का। हां, ईश्वर ने मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्राणि ज़रूर बनाया है। मनुष्य अन्य जीव-जंतुओं से इसलिए श्रेष्ठ व अलग है क्योंकि उसमें मनुष्यता के गुण हैं। उसमें संवेदनाएं है, दया है, सहानुभूति है और दूसरों के दर्द को समझने व महसूस करने वाला एक दिल भी है। वह अच्छे और बुरे के बीच में फ़र्क करने की सलाहियत रखता है। इन सबमें दया को मनुष्ता का सबसे बड़ा लक्षण माना गया है। यदि मनुष्य में दया नहीं तो वह जानवर की माफ़िक ही है। शास्त्रों में कहा गया है कि अहिंसा मानव धर्म का लक्षण है और प्राणियों का वध अधर्म है। जिस मनुष्य में प्राणियों के प्रति दया नहीं उसका तप-जप, शिक्षा-दीक्षा, ज्ञान-ध्यान सब निरर्थक है। मनुष्य इस सृष्टि का राजा ज़रूर है और अन्य प्राणि इसकी रयाया है। एक राजा के रूप में जीव जंतुओं का भक्षण व संहार नहीं, बल्कि रक्षण व संरक्षण उसका कर्तव्य है। कबीर दास जी ने कहा है- जीव मति मारो बापुरा, सबका एकै प्राण। हत्या कबहूं न छूटिहैं, जो कोटिन सुनो पुराण। अर्थात जीवों को नहीं मारना चाहिए क्योंकि सभी जीवों में एक जैसे प्राण होते हैं। जीव हत्या के पाप को आप पुराणों के करोड़ों वचन सुन कर भी नहीं धो सकते। 
    ऐसा नहीं है कि मनुष्य के वर्चस्व वाली इस दुनियां में पशु-पक्षियों से मोहब्बत करने वाले नहीं हैं। परंतु दुखद पहलू यह हैं कि जीव जंतुओं के साथ क्रूरता करने वालों की भी कमी नहीं हैं। कुछ दिनों पहले केरल के साइलैंट वैली फ़ॉरैस्ट में एक 15 वर्षीय हथिनी की विस्फ़ोटक पदार्थ खाने से दर्दनाक मौत हो गई। ये और भी विषादित करने वाला विषय है कि हथिनी गर्भवती थी। वह तीव्र पीड़ा को तीन दिन तक एक तालाब में खड़े-खड़े सहती रही और अंतत: अपने अजन्में बच्चे के साथ उसकी मौत हो गई। उसकी मौत के साथ इंसानियत की भी एक बार फ़िर मौत हो गई। इसी तरह की ह्र्दय विदारक घटना हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर के झंडूत्ता के डाढ गांव में भी सामने आयी है। यहां कुछ दिनों पहले विस्फ़ोटक पदार्थ चबाने से एक गर्भवती गाय बुरी तरह घायल हो गई। देवभूमि हिमाचल के लिए यह घटना कलंकित करने वाली ही कही जा सकती है। गाय या हथिनी मे से किसी ने शौक से स्वत: ही विस्फ़ोटक पदार्थ खा कर आत्महत्या करने की कोशिश तो नहीं की होगी। इन कुकृत्य के लिए मनुष्य ही जिम्मेदार रहा होगा। इन घटनाओं के सिलसिले में गिरफ्तारियां भी हुई हैं। वैसे जानवरों से क्रूरता की ऐसी घटनाएं अकसर सामने आती रहती हैं। 
    आपको याद होगा जुलाई 2016 में चिन्नई में एक कुतिया से क्रूरता का दिल रुला देने वाला मामला भी सामने आया था। सोशल मीडिया में वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें एक युवा एक कुतिया को छत की टैरैस से नीचे फ़ेंकता हुआ दिखाई देखा जा सकता है। अच्छा ये हुआ कि कुतिया बच गई और कार्तिक डंडपानी नामक एक जीव प्रेमी स्वयंसेवी ने इस कुतिया को गोद ले लिया और इसका नाम भद्रा रखा। रोचक है कि भद्रा से मिलने सदाशिवम नामक 68 वर्षीय जंतु प्रेमी कोयंबतूर से चिन्नई पहुंचा और उसने इस कुतिया को गले लगा कर बेज़ुबान जीव के प्रति अपना स्नेह जताया। दुखद है कि इस घटना को अंजाम देने वाले जो दो युवक थे, वे मैडिकल के छात्र थे अर्थात डॉक्टर बनने वाले थे। ये वाक्या दर्शाता है कि जहां जानवरों से प्रेम करने वाले मानवादी मौजूद हैं वहीं इन बेज़ुबान जानवरों से अमानवीय व्यवहार करने वाले लोग भी जहां-तहां मिल जाते हैं। कुछ रोज़ पहले सोशल मीडिया पर एक और वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक शख्स ने मिलन करते नाग-नागिन के जोड़े को काट डाला। 
    विडंबना है जहां एक ओर हम वानरराज हनुमान की पूजा करते हैं और उनकी 108 फ़ुट ऊंची प्रतीमा स्थापित कर अपनी आस्था का दंभ भरते हैं, वहीं दूसरी ओर वानरों की हत्या की खबरें देवभूमि हिमाचल में सामने आ रही हैं। कारण ये कि वे हमारी फ़सलों को नष्ट कर देते हैं। बंदरों को भगाने के कई और तरीके भी हो सकते हैं। जंगल पर्याप्त नहीं होंगे, तो भूख मिटाने के लिए खेतों की ओर रुख करेंगे। एक तरफ़ हम राजा शिबि की बात गर्व से करते हैं जिन्होंने कबूतर के मांस के बदले अपना पूरा शरीर बाज़ के समक्ष भक्षण के लिए रख दिया था, वहीं दूसरी तरफ़ बेझिझक पशु-पक्षियों का शिकार व मांस भक्षण को हम मानव का अधिकार समझते हैं। कहने को तो हम गाय को माता कह देते हैं, पर हमारी कथनी और करनी में बहुत अंतर है। जब तक गाय दूध देती है, तब तक उसका भरण-पोषण ठीक तरह से किया जाता है। परंतु जब वह दूध देने के काबिल नहीं रहती तो उसे जंगलों में हांक दिया जाता है। वैसे तो हम नंदी बैल की भी पूजा करते हैं, परंतु जहां बैलों से खेती नहीं की जाती, वहां बछड़ा पैदा होने पर उसे इतना कम भोजन दिया जाता है कि वह स्वयं मर जाता है या थोडा बड़ा होते ही उसे भी जंगल में छोड़ दिया जाता है। अगर ऐसा न होता तो सड़कों पर आज इतने सारे गाय-बैल कहां से आ रहे हैं। कसाईखानों में किस तरह जानवरों को तड़पा-तड़पा कर मौत के घाट उतारा जाता है, ये किसी से छुपा नहीं। आज भी धार्मिक स्थलों पर खास मौकों पर सैकड़ों बेज़ुबान बकरों की गर्दनें सरेआम अलग कर दी जाती हैं। आस्था का ढोल पीटने वाले इसे देवी देवताओं को खुश करने की परंपरा का हवाला देते हुए इसे जारी रखे हुए हैं। पहले तो कई बातें हुआ करती थीं जो आदमी के सभ्य होते-होते बदल गयीं। परंतु मालूम नहीं क्यों अंधविश्वास से भरी हुई ये धारणाएं आज भी बनी हुई हैं। पशु-पक्षी बोल नहीं पाते। इसका मतलब ये नहीं कि उन्हें दर्द और पीड़ा नहीं होती। यदि जानवरों से मनुष्य के जीवन को खतरा हो जाए, तो उस स्थिति में जानवरों का हनन उचित माना जा सकता है, परंतु बिना प्रयोजन के ही बेज़ुबान जीवों की हत्या कर देना, उन्हें पीड़ा पहुंचाना कहां का धर्म है, कहां का न्याय और कैसा अधिकार? याद रखो कुदरत अपना बदला कई रूपों में कई गुणा बढ़ा कर लेती है।

"पर्यावरण प्रदूषण वर्तमान विश्व की बड़ी चुनौती" -- हंसराज ठाकुर

इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस को जैव विविधता दिवस एवं सरंक्षण वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है I 
जैव विविधता पारिस्थितिक संतुलन को बनाये रखने में सहायक होती हैI विश्व में 1435662 प्रजातियों की ही अभी तक पहचान हो पाई है,जिनमे से कुछ परितंत्रों के क्षय के कारण विलुप्त भी हो रही है और कोरोना जैसे विषाणु इसी जलवायु परिवर्तन की उपज में से एक है,जिसकी उत्पत्ति का सही कारण व सही इलाज अभी खोजा जाना बाकि हैI कीट पतंग, पौधे, जन्तु, कवक, शैवाल, जीवाणु व् विषाणु ही मिलकर हमारी जैव विविधता को बनाते हैंI  22 मई को जैव विविधता दिवस व् 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता हैI प्रकृति में ही हमारी समस्याओं का हल है, इसी विषय के साथ इस बार जैव विविधता दिवस मनाया गया I  जैव विविधता हमारे पर्यावरण का ही कारक हैI
पर्यावरण मतलब पृथ्वी के चारों तरफ का आवरण-वायु, जल एवं स्थल की भौतिक, रासायनिक व जैविक विशेषताओं मे अवांछनीय परिवर्तन ही प्रदूषण है।विकास के वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे विश्व विकास की एक तरफा दौड़ में शामिल हो गया है।इस दिशा में सामाजिक, वैश्विक जागरूकता लाने हेतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत से पुरुस्कार भी समय समय पर दिए जाते रहे हैं।पूरे विश्व समुदाय के बुद्धिजीवी व पर्यावरणविदों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी समय समय पर होते हैं-मानक भी तय किए जाते हैं पर कहीं न कहीं जब इन नियमों के पालन की बात होती है तो सभी विकसित व विकासशील देश अपने विकास को तब्बजो देकर अपना पल्ला झाड़ते नजर आते हैं।यह मानव सभ्यता के लिए मंद विष के समान है।अतः पर्यावरण प्रदूषण के मानक निर्धारित करना व उनका अनुसरण करना आवश्यक ही नहीं अपितु अपरिहार्य है।पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाना वर्तमान के लिए ही नहीं अपितु सुरक्षित भविष्य के लिए भी आवश्यक है
पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर पर्यावरण प्रदूषण के मानक निर्धारित किए गए हैं।यात्री वाहनों के यूरो मानक, जल प्रदूषण के मानक, ध्वनि प्रदूषण के मानक एवं अन्य प्रदूषकों के लिए मानक सीमा निर्धारित की गई है।प्रसिद्ध पारिस्थितिक वैज्ञानिक ई.पी.हृओम के अनुसार"वायु, जल या भूमि के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में होने वाले ऐसे अनचाहे परिवर्तन जो मनुष्य व अन्य जीव धारियों, उसकी जीवन परिस्थितियों, औद्योगिक प्रक्रियाओं एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों के लिए हानिकारक हो, प्रदूषण कहलाता है"!
हमारे वायुमण्डल मे समुद्री सतह से 25-30 किलोमीटर की ऊंचाई मे(स्ट्रेटोस्फेयर)विविध मोटाई की ओजोन परत पाई जाती है जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी तरगों को अवशोषित करके मानव प्रजाति को त्वचा कैंसर जैसे जटिल रोगों से बचाती है।इस परत का क्षरण भी प्रदूषण का ही एक गम्भीर परिणाम है।घरों के रेफ्रिजरेटर मे इस्तेमाल होने वाली फ्रियोन गैस(क्लोरो फ्लोरो कार्बन)व अन्य प्लास्टिक उत्पादों के दहन से उत्पन्न एक क्लोरीन का अणू एक लाख ओजोन के अणुओं को आक्सीजन मे बदलकर लगातार इस परत का क्षरण कर रहा है।20वीं शताब्दी में कार्बन डाइऑक्साइड द्वारा उत्पन्न हरित गृह प्रभाव से हमारी पृथ्वी के औसतन तापमान(18*C)मे 0.5*Cकी वृद्धि हुई है जो 21वीं शताब्दी में बदस्तूर जारी है।ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हिमखंडों का पिघलना व समुद्री जल स्तर मे बढोतरी की बजह से समुद्री तटों से सटे विश्व के कई देशों पर जलमग्न होने का खतरा धीमी गति से मंडरा रहा है।हरित गृह प्रभाव उत्पन्न करने वाली गैसों मे मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, क्लोरो फ्लोरो कार्बन तथा नाइट्रस आक्साइड है।यूरो1(1992)से यूरो-6(2014)तक CO की मात्रा 2.72 से 0.50 व नाइट्रस आक्साइड की मात्रा 0.08 तक नियंत्रित करना प्रस्तावित था-मगर आज क्या यह वास्तविकता है?
हमें भ्रष्टाचार, गरीबी उन्मूलन, बेरोजगारी व आंतकवाद जैसी विकट समस्याओं के साथ साथ ग्लोबल वार्मिग, ओजोन छिद्र(लॉक डाउन के चलते प्रकृति ने इसमे प्राकृतिक रूप से सुधर भी किया), अम्लीय वर्षा व हरित गृह गैसों के नियंत्रण की तरफ भी प्रभावी ढंग से कदम उठाने होंगे।संपीडित प्राकृतिक गैस से चलने वाले व सौर ऊर्जा चालित(भूगोलिक परिस्थिति के अनुसार) वाहनों को और बढावा देने की जरूरत है और पर्यावरण मैत्री तकनीक को बढावा देकर वाहनों को यूरोपियन यूनियन एमिसन स्टैंडर्ड फार पैसेंजर्स कार के अनुरूप प्रचलन में रखा जाए।
हिमाचल प्रदेश नैसर्गिक सौंदर्य का भरपूर खजाना है।यहां की रमणीक वादियां व घाटियां पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं।यहां का शुद्ध पानी किसी मिनीरल वाटर से कम नहीं, यहां की शुद्ध हवा प्राणदायिनी है मगर यदि प्रदूषण इसी रफ्तार से यहां भी बढता गया तो वो दिन दूर नहीं जब हमें शुद्ध हवा को लेने के भी पैसे देने पडेंगे यानी शुद्ध हवा टैक्स।परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों को अपने शक्तिशाली होने के अहसास की बजाय, ज्यादा जिम्मेदार होने का अहसास होना चाहिए अन्यथा परमाणु विकीरण(रेडियो समस्थानिक से फैलने वाली किरणें)विश्व के किसी भी कोने में पहुंचकर रक्त कैंसर जैसी बिमारियां उत्पन्न कर सकती हैं।वायु प्रदूषण का प्रभाव तात्कालिक एवं बाध्यकारी होता है-भोपाल मिथाइल आइसोसाइनाइट गैस कांड को कोई कैसे भूल सकता है।
जल संसाधन से हमारी पृथ्वी समृद्ध है।पृथ्वी के तीन चौथाई भाग पर जल होने की वजह से इसे नीला ग्रह भी कहते हैं।समस्त जल का 2.09% जल ही मीठा व पीने योग्य जल है।जल की गुणवत्ता उसके pH मान ,गंदलापन, निलंबित कण, विद्युत चालकता, रासायनिक गुण, विभिन्न खनिजों की मात्रा, अम्लीयता, क्षारीयता, घुलित आक्सीजन, नाईट्रेट, फास्फेट आदि की मात्रा से निर्धारित की जाती है।आदर्श पेयजल का तापमान10*C से 15.6*C व pH 7.0 से 8.5 के बीच होना चाहिए।सरकार को जमीन में घटते जल स्तर को निंयत्रित करने हेतु आवश्यक कदम उठाने होंगे।
स्वर, संगीत, साधना मानव मे उमंग, उत्साह व आनंद का संचार करते हैं लेकिन आज 21वीं सदी में ध्वनि का औसत स्तर 20वीं सदी के मुकाबले लगभग40 गुणा अधिक हो गया है।हम 20 से 20,000 कम्पन्न प्रति सेकिंड तक की ध्वनि सून सकते है और उम्र के साथ इस सीमा का ह्रास होता है- 47 की उम्र तक यह13,000 कम्पंन प्रति सेकिंड रह जाती है।आवासीय क्षेत्रों में 45-55 डेसीबल,व्यापारिक क्षेत्रों में 55-65 डेसीबल व औद्योगिक क्षेत्रों में 70-75 डेसीबल तक की ध्वनि स्वीकार्य है।
प्रदूषण के मानक तो विश्व भर में निर्धारित हो गए लेकिन पर्यावरण प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कौन है, इसका निर्धारण भी होना चाहिये।विकसित देश लगभग 66% ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं-अमेरिका 25-30%,रूस 15% गैसों का उत्सर्जन करता है।विकासशील देशों में चीन 12%और भारत 3% ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है।यह समस्या मानव निर्मित है।वेशक औद्योगिक विकास को रोका नहीं जा सकता लेकिन इसको मानव सभ्यता के विकास एवं हित में पर्यावरण प्रदूषण के मानक लागू करके नियंत्रित तो अवश्य किया जा सकता है, जिससे मानव युक्त ग्रह पृथ्वी पर मंडरा रहे पर्यावरण प्रदूषण से निर्मित गम्भीर खतरे को टाला जा सकता है अन्यथा विकास का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा, जब हमारे जीवन के साथ अन्य जीवों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जायेगा।आम जनमानस के सहयोग के साथ साथ देश व प्रदेश सरकार को इस दिशा में बडे पैमाने पर कदम उठाने होंगे व उनकी अनुपालना भी सुनिश्चित करवानी होगी।

लेखक: हंसराज ठाकुर प्रवक्ता भुतिक शास्त्र रा आ व् मा वि हट्गढ़ जिला मंडी (हि.प्र.)-175027
          

ऑनलाइन शिक्षा कितनी उपयोगी- प्रियम्बदा शर्मा

शिक्षा किसी भी राष्ट्र की उन्नति का मूलभूत आधार है। बिना शिक्षा के मनुष्य पशु तुल्य है। भारत देश पूर्व काल से ही विश्व गुरु के रूप में जाना जाता रहा है यहां धनधान्य की भी प्रचुरता रही है। परंतु अफसोस यह कि यह गुलामी की बेड़ियों में ही जकड़ा रहा।फिर भी यहां की सांस्कृतिक परंपरा यहां की शिक्षा को आक्रांता प्रयासों के बाद भी समाप्त नहीं कर पाए। भारत में, भारतीय भू धरा पर ईश्वर की अपार कृपा है। यदि हम अपने पौराणिक ग्रंथों को उठाकर देखें तो यही पाएंगे कि सब जगह भारत भू धरा को ही श्रेष्ठ बताया गया है। ऐसी श्रेष्ठ धरा पर जन्म लेना  किसी पुण्य का ही फल है उससे भी अधिक पुण्य है उस जन्म को सार्थक बनाए रखने के लिए प्रयास करना। 
आज जब संपूर्ण विश्व कोरोनावायरस की महामारी के संकट से त्राहि-त्राहि कर रहा है और भारत भी इससे अछूता नहीं है परंतु फिर भी यहां मृत्यु की दर अन्य देशों की अपेक्षा कम है। पूरी जनता प्रधानमंत्री महोदय के साथ मिलकर, डटकर इस बीमारी रूपी अदृश्य शत्रु से निपटने को तत्पर है। लॉक डाऊन का उल्लंघन करने वालों के लिए सजा का प्रावधान जैसी व्यवस्थाएं की गई है ताकि अनुशासन बना रहे जो अनिवार्य भी है। आमजन घरों में बैठने को मजबूर हैं और देश के रक्षक मेडिकल स्टाफ, पुलिसकर्मी व अन्य लोग अपनी सेवाएं दे रहे हैं। देश के नागरिकों को आत्मनिर्भर बनने का संदेश प्रधानमंत्री दे रहे हैं। यह सब बिना शिक्षा संभव ही नहीं यह हमें यह अनिवार्य रूप से समझना होगा। सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को कायम रखने के लिए ऑनलाइन कक्षाएं चला दी है क्योंकि ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली को अपनाना ही अब एक मात्र विकल्प रह गया जब ऐसा स्वाभिमानी शत्रु दरवाजे पर खड़ा है जो भीतर प्रवेश तभी करेगा जब आप उसे स्वयं लेने बाहर जाएंगे। अतः इस विकट परिस्थिति में राष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों कॉलेजों और विश्वविद्यालयों ने जूम एप, गूगल क्लासरूम, और भी विभिन्न प्रकार के यूट्यूब, व्हाट्सएप आदि को ऑनलाइन शिक्षण के माध्यम के लिए वैकल्पिक रूप से अपना लिया है। जिसके लिए विभिन्न शिक्षाविद राष्ट्रीय स्तर पर अपने भाषणों संबोधनों और शिक्षण शिक्षण सामग्री के साथ शिक्षा के प्रचार-प्रसार में लगे हुए नजर आ रहे हैं। 
इसी संदर्भ में यदि हम हिमाचल प्रदेश को ही लें तो यहां भी सरकार शिक्षा व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कटिबद्ध होकर अन्य राज्यों की तर्ज पर प्रयास करने का भरसक प्रयास कर रही है। वहीं शिक्षक भी अपनी पूर्ण क्षमता और दक्षता का परिचय देते हुए ऑनलाइन पढ़ाई करवाने में जुटे हैं। परंतु निसंकोच हमें कहना होगा कि यह प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे जैसा ही है। ऐसा क्यों....? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें यहां ऑनलाइन शिक्षण के फायदे और नुकसान दोनों पर ही ध्यान केंद्रित करना होगा।  "हर घर पाठशाला" योजना के तहत हिमाचल सरकार ने सभी अध्यापकों और छात्रों को ऑनलाइन शिक्षा से जोड़ने का सराहनीय प्रयास किया। यह प्रयास कितने बच्चों को और किस प्रकार लाभान्वित कर पाया यह विचारणीय है। उदाहरण के तौर पर किसी कक्षा में कुल 70 विद्यार्थी हैं जिनमें से 30 विद्यार्थी व्हाट्सएप पर जुड़ पाए परंतु केवल मात्र 10 ही विद्यार्थी लाभान्वित हो सके कारण नेटवर्क समस्या, नेट पैक ना होना, एक ही फोन से घर के बहुत से बच्चों का पढ़ाई में संलग्न होना आदि।  इसके अतिरिक्त कई बच्चे ऐसे भी पाए गए जो इस माध्यम का दुरुपयोग करते हैं जैसे अध्यापकों के साथ व्हाट्सएप द्वारा अनावश्यक बातें करना मना करने पर अभद्र भाषा का प्रयोग जैसी स्थितियां भी देखने को मिली। बात यहीं तक सीमित रहती तो गनीमत थी परंतु जिन कारणों को ध्यान में रखकर जिस फोन को स्कूलों में प्रतिबंधित किया गया था वहीं जब शिक्षा का आधार बन कर सामने आया तो परिणाम यह भी देखने को मिले कि कम उम्र के बच्चों का शारीरिक और मानसिक पतन हुआ है। नैतिकता में भारी गिरावट आई है। छात्र स्कूलों में 6 घंटे का समय बिताते थे और बच्चे अध्यापकों के निरीक्षण में अनुशासन में रहने के लिए प्रतिबद्ध थे। घरों में रहकर कितने अविभावक  अपने बच्चों पर नियंत्रण रख पाते हैं यह स्थिति ऑनलाइन शिक्षा ने उजागर कर दी है। इतना ही नहीं मोबाइल के अत्यधिक प्रयोग ने बच्चों के स्वास्थ्य पर भी कुप्रभाव डालना शुरू कर दिया जैसे आंखें खराब होना, पाचन संबंधी समस्याएं, तनाव, चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो गई जिस से निजात पाना भविष्य में आसान नहीं होगा। शिक्षकों के द्वारा ऑनलाइन पढ़ाई करवाते हुए उनके अभिभावकों व स्वयं छात्रों से मिली जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से 1% भी बच्चे लाभान्वित नहीं हो पाए हैं। हालांकि सरकार ने तो दूरदर्शन पर भी कार्यक्रम चलाकर बच्चों को शिक्षित करने का प्रयास किया  जो सराहनीय है। परंतु यह कितनों को लाभान्वित करने वाला है यह भी विचारणीय होना चाहिए। जिन लोगों के पास मोबाइल नहीं है, टेलीविजन या अन्य प्रकार की सुविधाएं नहीं हैं वे छात्र कुंठित हैं और जिनके पास हैं वे पूर्ण लाभ उठाने से वंचित हैं। वास्तव में शिक्षाविदों को कोई भी योजना चलाने से पहले उसके फायदे तो देखने चाहिए परंतु उससे होने वाले नुकसान का आकलन पहले अनिवार्य रूप से कर लेना चाहिए और इससे भी अधिक वहां का वातावरणीय स्थिति को ध्यान में रख कर, साथ ही साथ बच्चों की मनोवैज्ञानिकता को ध्यान में रखकर ही कार्य निर्देश जारी किए जाने चाहिए। अन्यथा आकाश से गिरे और खजूर पर अटके की स्थिति से निपटने के लिए तैयार होना पड़ता है। यदि केवल कागजी स्तर पर कार्यवाही की जाए और जमीनी स्तर पर समस्याओं का आकलन न किया जाए तो परिणाम और परिस्थितियां भयावह होते हैं। 23 मार्च से बंद शिक्षण संस्थान 31 मई तक बंद किए गए और आगे भी कब तक बंद रहेंगे यह सुनिश्चित नहीं है। ऐसी अनिश्चितता की स्थिति सरकार के लिए और शिक्षाविदों के लिए परीक्षा का समय है। क्योंकि यह प्रश्न और समय देश के भावी पीढ़ी को बचाने का है वास्तविकता यदि देखी जाए तो देव भूमि हिमाचल प्राकृतिक संपदा से भरा हुआ प्रदेश है यहां के लोग जुझारू हैं तथा प्रकृति के वाशिंदे हैं। जिनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है यही कारण है कि कोरोना जैसी महामारी यहां पैर पसारने में असफल रही है। परंतु अब यहां भी जो पॉजिटिव लोग आने लगे हैं उनका कारण केवल और केवल बाहरी राज्यों से आए संक्रमित व्यक्ति हैं यदि प्रदेश सरकार इस तरफ सख्ती से ध्यान दें बाहर से आने वाले लोगों को सीमाओं पर पर ही क्वॉरेंटाइन करके रखें। भलीभांति जांच परख कर ही प्रदेश में प्रवेश की अनुमति दे और प्रदेश के भीतर अपनी अर्थव्यवस्था और अन्य गतिविधियों को चलाएं रखें तो स्थिति पर निश्चित रूप से नियंत्रण किया जा सकता है। इसके साथ ही ऐसे न्यूज़ चैनलों पर भी नियंत्रण होना चाहिए जो सही खबरें भी दहशत के साथ लोगों तक पहुंचाते हैं जिसके कारण ऐसा प्रतीत होता है कि लोग कोरोना महामारी से मरे ना मरे, दहशत से जरूर मर जाएंगे। हिमाचल प्रदेश सरकार को विशेष रूप से यह स्वीकारना चाहिए कि यहां की जनता उनके बनाए नियमों की पालना के लिए कटिबद्ध है। अतः सरकार को सख्ती के साथ प्रदेश हित में निर्णय लेने चाहिए, छात्र हितों के लिए आवश्यक रूप से सोचना चाहिए। 
शिक्षा, शिक्षक और छात्र यह मिलकर एक त्रिकोण का निर्माण करते हैं देश की सेवा में इस समय जो लोग सबसे आगे खड़े हैं फ्रंट वारियर्स बने सैनिक अन्य कर्मचारी भी शिक्षित होकर ही यह कार्य करने में समर्थ हैं। वास्तव में शिक्षा और शिक्षक नींव हैं, मूल आधार हैं। इनकी अवहेलना नहीं की जानी चाहिए। जहां शिक्षकों का सम्मान नहीं होता वह राष्ट्र विनाश को प्राप्त हो जाता है इतिहास इसका गवाह है। 
कोई भी विपत्ति या आपदा हमेशा नहीं रहती परंतु विपत्ति के समय लिए गए निर्णय अवश्य ही स्थाई प्रभाव छोड़ते हैं सरकार ने पैरा, पैट, अनुबंध, एसएमसी आदि कई वर्गों के शिक्षकों की सेवाओं पर मंडरा रहे संकट को संकटकालीन स्थिति में तत्काल बहाल कर अपने तारणहार होने का परिचय दिया साथ ही छात्रों को भी तुरंत अगली कक्षाओं में प्रमोट करके अपनी करुणा दिखाई। परंतु ऐसे शिक्षक जिन्हें योग्यता होते हुए भी उनका उचित पद नाम नहीं दिया गया या ऐसे छात्र जो योग्य होते हुए भी गधे घोड़े बराबर कर दिए गए क्या वे सरकार से न्याय की गुहार नहीं करेंगें..? 
कहा गया है कि - 
"सहसा विदधीत न क्रिया 
मविवेकः परमापदां पदम्।। 
अर्थात् बडी़ आपत्ति आने पर भी जल्दबाजी में कोई काम न करें। 
इस उक्ति को ध्यान में रख कर लिए गए निर्णय दूरगामी प्रभाव छोडते हैं। 
बहरहाल सरकार को बाहरी राज्यों से या अन्यत्र स्थानों से आने वाले लोगों को सीमाओं पर ही क्वारनटाइन करके रखना चाहिए, और प्रदेश हित को ध्यान में रखते हुए तुरंत परिवहन सेवाएं प्रदेश में चलाकर शिक्षण संस्थाओं को खोलने की व्यवस्थाएं बनाने की योजना पर कार्य करना चाहिए। जनता तो सरकार के साथ पूर्णतया खड़ी है जिसका सरकार को लाभ ही मिलना है।
प्रियंवदा
सुंदरनगर जिला मण्डी 
हिमाचल प्रदेश

शिक्षा, विधि एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश भारद्वाज ने आज यहां वीडियो काॅन्फ्रेंसिंग -- डा माम राज पुंडीर

शिक्षा, विधि एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश भारद्वाज ने आज यहां वीडियो काॅन्फ्रेंसिंग के माध्यम से शिमला शहर के लगभग 100 बुद्धिजीवियों के साथ हिमाचल प्रदेश में आर्थिकी तथा लाॅकडाउन के बाद की स्थिति के लिए सुझाव आमंत्रित किए एवं प्राप्त सुझावों पर विचार-विमर्श किया।
शिक्षा मंत्री ने कहा कि विश्व के विकसित तथा शक्तिशाली राष्ट्र के मुकाबले भारत देश एवं प्रदेश ने कोरोना वायरस से डटकर मुकाबला किया है। उन्होंने बताया कि कोरोना महामारी के चलते प्रदेश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में आधारभूत संरचना को सुदृढ़ किया गया है ताकि इस महामारी को परास्त किया जा सके।
उन्होंने बताया कि लाॅकडाउन के दौरान स्कूल के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है लेकिन प्रदेश सरकार द्वारा डिजिटल एजुकेशन के माध्यम से बच्चों को शिक्षा प्रदान करने का निर्णय लिया गया, जिसके माध्यम से प्रदेश के बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि केन्द्र सरकार के दिशा-निर्देशानुसार अनलाॅक-1 के तहत शिक्षण संस्थानों को खोलने का प्रावधान है।
इस अवसर पर वीडियो काॅन्फ्रेंसिंग के माध्यम से शिक्षा मंत्री ने उपस्थित लोगों से सुझाव आमंत्रित किए जिसमें एडवोकेट जनरल अशोक शर्मा ने बताया कि अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए प्रदेश सरकार आगे के कदम उठाए ताकि आर्थिकी को सुदृढ़ किया जाए एवं पर्यटन के क्षेत्र में हुए नुकसान को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिए जाए ताकि क्षेत्र को आगे बढ़ाया जा सके। 
आईजीएमसी के एम.एस. जनक राज ने अपने सुझाव में बताया कि प्राईमरी स्तर के बच्चों को घर पर ही शिक्षा देने का प्रयास करने की आवश्यकता है ताकि छोटे बच्चे इस वायरस से प्रभावित न हो। उन्होंने बताया कि 1 जून से बसें और टैक्सियां शुरू हो जाएगी, जिससे हम सबको सामाजिक दूरी, साफ-सफाई, बार-बार हाथ धोना, सैनेटाइजर का इस्तेमाल करने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि स्कूलों में सामाजिक दूरी को बनाएं रखने के लिए कक्षाओं में विभिन्न सेक्शन बनाने की आवश्यकता है।
हिमाचल प्रदेश उच्च शिक्षा के अध्यक्ष सुनिल गुप्ता ने बताया कि शिक्षण संस्थानों को सबसे अंत में शुरू किया जाना चाहिए ताकि बच्चों में संक्रमण न फैले। उन्होंने बताया कि आॅनलाइन और डिजिटल एजुकेशन के माध्यम पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है।
वीर सिंह जांगड़ा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय भौतिकी विभाग ने अपने सुझाव में कहा की प्रदेश में सभी काम ठप पड़े हुए हैं लेकिन अब इसे धीरे-धीरे खोलने की जरूरत है लेकिन प्रदेश तथा केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा। उन्होंने बताया कि शिक्षण संस्थानों को भी धीरे धीरे खोलने की आवश्यकता है। 
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद प्रदेश पूर्व अध्यक्ष एवं प्रोफेसर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय डाॅ. नितिन व्यास ने अपने सुझाव में बताया कि पर्यटन के क्षेत्र को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है और हिमाचल प्रदेश पर्यटन क्षेत्र के लिए जाना जाता है। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए हिमाचल प्रदेश में क्वाॅरेंटाइन टूरिज्म को बढ़ावा देने की आवश्यकता है ताकि यहां के स्वच्छ वातावरण व खाने-पीने से उनका इम्यूनिटी सिस्टम को बढ़ाया जा सके।
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला लक्कड़ बाजार के प्रधानाचार्य भूपेंद्र सिंह ने अपने सुझाव में बताया कि दूर-दराज क्षेत्रों के स्कूलों को खोला जाना चाहिए ताकि वहां के बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो। उन्होंने बताया कि दूर-दराज क्षेत्रों में अभी संक्रमण फैलने का खतरा नहीं है। 
आईजीएमसी से डाॅ. बृज शर्मा ने अपने सुझाव में बताया कि प्रदेश एवं केंद्र सरकार द्वारा जारी की गए निर्देशों का हम सबको पालन करने की आवश्यकता है ताकि हम इस कोरोना महामारी से जंग जीत सकें।
महाविद्यालय के प्रोफेसर डाॅ. जेपी कपूर ने बताया कि स्कूल तथा काॅलेजों में परीक्षाओं को कैसे आयोजित किया जाए, इसके लिए प्रदेश सरकार दिशा-निर्देश जारी करें ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो। उन्होंने बताया कि आर्थिकी को मजबूत करने तथा रोजगार को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय प्रोडक्ट्स के लिए प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है।
यू.एस.ए. से स्काॅलर सुरभी सूद ने बताया कि आॅनलाइन मैप माॅड्यूल के माध्यम से आॅब्जेक्टिव टाइप प्रश्न पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि आॅनलाइन माध्यम से एमसीक्यू को आसानी से किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि कम्युनिटी सेंटर के माध्यम से हम शिक्षा को प्रदान कर सकते हैं।
महाविद्यालय प्रोफेसर आर.के. ठाकुर ने बताया कि परीक्षाओं को 3 घंटे के बजाय 2 घंटे किया जाना चाहिए तथा कक्षाओं का सेक्शन भी अलग-अलग सेक्शन में किया जाना चाहिए ताकि सामाजिक दूरी बनी रहे।
डाॅ. प्रमोद चैहान होटलयर ने अपने सुझाव में बताया कि शिक्षा के क्षेत्र को रिइमेजिंग और रीडिफाइन करने की आवश्यकता है इसके साथ-साथ डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को सुदृढ़ करने तथा कम्युनिटी रेडियो स्टेशन को बढ़ावा देने की आवश्यकता है ताकि एक कम्युनिटी में हर प्रकार की जानकारी एक रेडियो माध्यम से उपलब्ध करवाई जा सके।
क्लस्टर विश्वविद्यालय कुलपति डाॅ. सी.एल. चंदन ने अपने सुझाव में बताया कि हिमाचल प्रदेश में एडवेंचर टूरिज्म की बहुत बड़ी संभावना है, जिसे प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। इसके साथ-साथ रिलिजियस टूरिज्म को भी बढ़ावा देने की आवश्यकता है। 
किस्मत कुमार प्रांत कार्यवाहक आर.एस.एस. ने अपने सुझाव में बताया कि स्कूलों को शुरू करने से सभी प्रकार के एहतियात बरतने की आवश्यकता है। परीक्षाओं के दौर में कैसे बच्चों को सुरक्षित रखा जाए यह एक सोचने का विषय है। उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार एवं प्रशासन बधाई के पात्र हैं जो वायरस को रोकने में कामयाब रहा है।
होटलयर महेंद्र ने अपने सुझाव में बताया कि होटलों को खोलने में प्रदेश सरकार को जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए ताकि प्रदेश में कोरोना वायरस संक्रमण न फैले। उन्होंने बताया कि कोरोना वायरस के दौर में टूरिस्ट डेस्टिनेशन का विकास करने की आवश्यकता है। 
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से डाॅ. सुरेंद्र शर्मा ने अपने सुझाव में बताया कि बच्चों की मेंटल हेल्थ को ध्यान में रखने की आवश्यकता है। 
शिक्षा मंत्री ने बताया कि कोरोना वायरस से सारी दुनिया के विकसित राष्ट्रों को भी धराशाई कर दिया है तथा भारत जैसे राष्ट्र ने इस महामारी का डटकर मुकाबला किया है और आज के समय में स्वास्थ्य के क्षेत्र में अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर दिया है।
उन्होंने बताया कि इस कोरोना महामारी के दौर में एक लाख से अधिक व्यक्ति हिमाचल प्रदेश में वापस लौटे हैं तथा प्रदेश सरकार द्वारा टैलेंट मैपिंग की जाएगी, जिसके लिए सभी बुद्धिजीवियों से सुझाव आमंत्रित किए। उन्होंने बताया कि विभिन्न क्षेत्रों में सभी चीजों पर हम सबके विचार करने से हमें अवश्य सफलता हासिल होगी। उन्होंने बताया कि आर्थिकी को सुदृढ़ करने के लिए धीरे-धीरे सभी चीजों को शुरू करने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि सभी लोग लिखित रूप से सरकार को सुझाव भेजें ताकि आने वाले समय में उन सुझाव को ध्यान में रखते हुए सरकार निर्णय ले सके।
इस बैठक में डाॅक्टर्स, कुलपति, प्रोफेसर, वकील, काॅलेज के प्रधानाचार्य, प्राध्यापक, स्कूल के प्रधानाचार्य, शोधार्थी सहित शहर के जाने-माने व्यक्तित्व ने भाग लिया।
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आओ बच्चो, शतरंज खेलें -- जगदीश बाली

देखे होंगे तुमने कितने सिकंदर-ओ-वज़ीरों को जंग जीतते हुए, हमने तो बादशाहों को देखा है प्यादों से मात खाते हुए। मैं शह और मात के उस खेल की बात कर रहा हूं जिसमें मात खाने के बाद भी खिलाड़ी जीतने की तमन्ना नहीं छोड़ता। मैं शतरंज की बात कर रहा हूं। शतरंज, जिसे अंग्रेज़ी में चैस कहते हैं, दो शब्दों के मेल से बना है- शत और रंज। शत यानि सौ और रंज यानि नाराज़गी, निराशा, दुख या अवसाद। इस तरह शतरंज का मतलब हुआ सौ तरह के रंज से पार पाने वाला खेल। इसे पहले चतुरंग अर्थात सेना भी कहा जाता था। यह चौकोर बोर्ड पर चौंसट चौकोर खानों में छ: तरह के बत्तीस मोहरों के साथ खेला जाने वाला खेल है।
 बच्चे फ़ितरतन ही उछल-कूद करना व खेलना पसंद करते हैं। पर कोरोना काल के लॉकडाउन व शारीरिक दूरी के चलते वे बाहर निकल कर ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। वे घर में बैठे ऑन लाइन पढ़ाई के साथ-साथ मोबाइल फ़ोन पर गेम खेल कर ही अपना शौक पूरा कर रहे हैं। परंतु इस समय अगर बच्चों का ध्यान शतरंज जैसे खेल की ओर मोड़ा जाए, तो खेल के साथ उनके बौद्धिक व व्यक्तित्व विकास को नई दिशा मिल सकती है। आज विश्व में लगभग 1500 ग्रैंडमास्टर हैं, जिनमें लगभग 38 ग्रैंडमास्टर 15 वर्ष से कम उम्र के हैं, जिन्हें चाइल्ड प्रॉडिजी कहा जाता है। इन्में 7 भारत के हैं। भारत के 12 वर्ष 7 महीने और 17 दिन के डी. गुकेश 12 वर्ष 7 महीने के सर्गे कर्जेकिन के बाद विश्व के दूसरे नंबर के चाइल्द प्रोडिजी है। ज़ाहिर है उपलब्धियां हासिल करने के लिए उम्र, कद-काठी नहीं, बल्कि संकल्प व निरंतर अभ्यास मायने रखते हैं। शतरंज यही सिखाता है।
नवंबर 2017 में जब भूटान नरेश ज़िग्मे वांगचुक भारत आए थे, तो हमारे देश के प्रधानमंत्री मोदी ने उनके देढ़ वर्षीय पुत्र को भेंट में एक चैस सैट दिया था। शतरंज की बात करते ही मैगनस कार्ल्सन, गैरी कास्परोव, अनातोली कारपोव, बॉबी फिशर जैसे चेहरे आंखों के सामने घूम जाते हैं। हमारे ज़हन में चश्मा पहने शतरंज खेलते हुए विश्व चैंपियन भारतीय ग्रैंडमास्टर विश्वनाथन आनंद का ख्याल आता है और हमारा सर गर्व से ऊंचा हो जाता है। आनंद का सपना है कि देश के प्रत्येक स्कूल में शतरंज खेला जाए। संयोग की बात है कि है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री भी शतरंज के बारे में ऐसी ही राय रखते हैं। भारत में 64 ग्रैंड मास्टर हैं। लिहाजा शतरंज में भारत की स्थिति अच्छी मानी जा सकती है। क्या ही अच्छा हो कि हमारे प्रदेश से भी कोई ग्रैंड मास्टर बने। अत: प्राथमिक स्कूलॊं से लेकर स्कैंडरी स्कूलों तक शतरंज को बच्चों का पसंदीदा खेल बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। शिक्षा विभाग अब प्रदेश के बच्चों को खंड, जिला, राज्य व राष्ट्रीय स्तर तक आयोजित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए तैयार कर रहा है। इस दिशा में मंडी ज़िला शतरंज संघ महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। हाल ही में संघ ने कोरोना सोलिडेरिटी फ़ंड के लिए कोरोना फ़ाईटर ऑनलाइन शतरंज प्रतियोगिता का आयोजन किया। वरिष्ठ राष्ट्रीय आरबिटर व गुरकोठा के राजकीय विद्यालय में तैनात इतिहास के प्रवक्ता राज कुमार शर्मा ने इस ऑनलाइन प्रतियोगिता को सफ़लतापूर्वक करवाया। शतरंज को बढ़ावा देने के लिए ऑनलाइन प्रतियोगिता अब भी जारी है। उल्लेखनीय है कि हमारे प्रदेश के लिए गर्व का क्षण तब अया जब प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय में संयुक्त निदेशक के पद पर तैनात हितेश आज़ाद ने राजकीय आदर्श विद्यालय हटगढ़ के भौतिक विज्ञान के प्रवक्ता हंस राज ठाकुर के साथ पिछले वर्ष मंडी शतरंज संघ द्वारा मतदाता जागरुकता हेतु आयोजित शतरंज मैराथन में 53 घंटे 17 मिनट व 49 सैकिंड शतरंज खेल कर लगातार सबसे लंबे समय तक शतरंज खेलने कर विश्व रिकॉर्ड बनाया और दोनों ने वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में जगह बनाय़ी। स्वयं चैस के बेहतरीन खिलाड़ी होने के साथ अब वे और उनकी टीम चैस को लोकप्रिय खेल बनाने में जुटी हुई है। 
 वैज्ञानिक ब्लेज़ पास्कल ने कहा है कि शतरंज मनुष्य के दिमाग की व्यायामशाला है। शतरंज बच्चों के बौद्धिक विकास में अहम भूमिका निभा सकता है। शतरंज खेलते समय मानव मस्तिष्क का दांयां और बांया दोनों पक्ष एक साथ काम करते हैं। पहली चाल चलने से पहले तो चैस बोर्ड पर मोहरे सुव्यवस्थित लगते हैं। परंतु प्रत्येक चाल के बाद वैकल्पिक चालों की संख्या बढ़ती चली जाती है। एक अनुमान के अनुसार तीन चालों के बाद लगभग 9 मीलियन, चार चालों के बाद 288 बीलियन और पूरी बाज़ी में औसतन ब्रह्मांड में उपलब्ध इलैक्ट्रॉन से अधिक संभावित विकल्प होते हैं। जैसे इस खेल में मोहरे आड़ी तिरछी चालें चलते हैं, मस्तिष्क भी उन चालों की तरह विभिन्न संभावनाओं को तेज़ी से तलाशने लगता है। इससे मस्तिष्क की प्रोसैसिंग तीव्र हो जाती है। शतरंज में तरह तरह की परिस्थियों से गुजरते व जूझते हुए खिलाड़ी का इंटैलिजैंस कोशैंट बढ़ता जाता है। उसकी तार्किक व वैचारिक शक्ति भी अपेक्षाकृत कहीं अधिक होती है। यह खेल मानव कल्पना, स्रूजनात्मकता व दूरदर्शिता को मज़बूत करता है। स्मरण शक्ति तेज़ बनी रहती है। यह तर्क, विचार, संभावनाओं व समन्वय की गणना का खेल है। लिहाजा यह गणित के विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगि है। आज के तनाव व अवसाद से भरे जीवन में तो शतरंज और भी महत्वपूर्ण है। इस तरह शतरंज जीवन में हार कर भी हौंसला न छोड़ने की भावना भर देता है। शतरंज गलतियों के विरुद्ध एक संघर्ष है। हर नई बाज़ी में वह अपनी गलती को सुधारता जाता है।   
 शतरंज से बच्चों को नकारातमक कार्य में समय नष्ट करने से बचाया जा सकता है। आज हमारे बच्चे नशे के गर्त की ओर जा रहे हैं। उन्हें इस खेल को खेलने के लिए प्रेरित किया जाए, तो वे काफ़ी हद तक नशे से दूर हो जाएंगे। गैरी कास्परोव के रूस में 256 ग्रैंडमास्टर हैं क्योंकि वहां शतरंज संस्कृति का अंग है। वहां शादी में दुल्हन को गिफ़्ट में चैसबोर्ड दिया जाता है। हमारे प्रदेश में भी शतरंज एक संस्कृति बने, इसके लिए ज़रूरी है हर स्कूल का हर बच्चा शतरंज खेले। यह कोई मुश्किल काम नहीं क्योंकि इस खेल के लिए न मैदान की आवश्यकता है और न ही बहुत बड़ी धन राशी की। 300 से 400 रू में एक चैस सैट आ जाता है। कमरा तो स्कूलों में होता ही है। लॉकडाउन व शारीरिक दूरी के इस काल में ऑन्लाइन चैस का विकल्प तो और भी उपयोगि है। तो फ़िर आओ बच्चो, शतरंज खेलें।

भीड़ -- जगदीश बाली

पकड़ो...पकड़ो...मारो...मारो...मारो... ये डरावनी आवाजें हैं। ये वो आवाज़ें हैं जिन्हें सुनते ही दिल कांप उठता है। ये आवाज़ें जब कानों में गूंजती हैं तो खौफनाक मंज़र आंखों के सामने उभर आता है। ये उन्मादी भीड़ की आवाज़ें हैं जो इस देश में थम नहीं रही। अगर थमती हैं तो फिर अचानक किसी रोज़ उभर आती हैं। ये वो आवाज़ें हैं जिनके शोर-गुल में बाकि सारी आवाज़ें दब कर रह जाती हैं। ये वो शोर है जिसमें इन शब्दों के अलावा कुछ और सुनाई नहीं देता। ये भीड़ का शोर है, उस भीड़ का शोर है जिसके अपने ही सवाल है, अपने ही जवाब हैं और अपने ही तर्क हैं या यूं कहिए कि तर्क हैं ही नहीं। ये वो भीड़ है जो जिस ओर चल पड़ी तो बस चल पड़ी। पकड़ो, पीटो, मारो के ऐसे ही शोर में ऐसी ही एक भीड़ ने महाराष्ट्र के पालघर ज़िले के गणचिंचले गांव में गत 16 अप्रेल को जूना अखाड़े के दो साधुओं कल्पवृक्ष गिरि सुशील गिरी व चालक नीतीश तेलगनी को बेरहमी से पीट-पीट कर मार डाला। गुनाह कोई नहीं। बस उन पर गुनाह का शक मात्र था। शक था कि वे बच्चों के चोर हैं। गांव में बच्चे के चोर की अफ़वाह फ़ैली थी और फ़िर क्या था। न सच जानने की कोई जहमत न कानून की कोई परवाह। भीड़ ने सारी तहकीकात, कायदे-कानून, मुकद्दमा, सब अपने हाथ में ले लिया। तुरंत वहीं फैसला कर डाला और सज़ा-ए-मौत सुना डाली और मौत दे भी डाली। उधर कानून के प्रहरी या तो तमाशबीन बने रहे या उन्होंने खुद को भीड से बचाने में ही गनीमत समझी। इस तरह मानवीय मर्यादाओं की पृष्ठभूमि वाले महान भारत देश के इतिहास के पन्ने में एक बार फ़िर इंसानियत के कत्ल का एक और मामला दर्ज़ हो गया। 
सचमुच भीड़ अंधी होती है और गलत और सही देखने की इसमें कोई सुध नहीं होती। भीड़ अक्सर विवेकहीन होती है और उन्माद में इसे होश ही नहीं होता कि ये किधर जा रही है। इसे न अपने रास्ते का इल्म होता है, न मंजिल का कोई अता-पता और न ही यह अंजाम का विचार कर पाती है। ये तो बस जिस ओर चल पड़ी तो बस चल पड़ी। कई बार चालाक व सोच-समझ वाले लोग कोई नैरेटिव तैयार कर आम लोगों को एक नसमझ व उन्मादी भीड में बदल देते हैं। फ़िर इस भीड को जिधर ले चलो उधर चल पड़ती है। इस भीड़ को जिधर ठेल दो, ये उधर ही बढ़ जाती है। ये किसी की भी जान लेने को आतुर हो उठती है। और कई बार महिलाएं, बच्चे, बूढ़े भी इस भीड में शामिल कर लिए जाते हैं। जब ये भीड़ किसी पर टूट पड़्ती है, तो सभी तर्क धरे के धरे रह जाते हैं। उस वक्त मानवता अस्तित्वहीन हो जाती है। वीडियो बनाए जाते हैं और इंसानियत के सब तकाज़े और कायदे कहीं पानी भरने चले जाते हैं। कानून असहाय जान पड़ता है या फ़िर किसी तमाशबीन की तरह तमाशा देखता है। बाद में कुछ लकीरें खींच कर उन्हें पीटा ज़रूर जाता है। न्याय-अन्याय का तराज़ू कभी इस पासे, कभी उस पासे डोलता रहता है और भीड़ से गुनाहगारों को ढूंढता फिरता है। पर भीड़ तो भीड़ है, इसकी भला क्या पहचान। ये पूरी बेगुनाह या फिर पूरी गुनाहगार। 
ये भीड़ बाढ़ की तरह ही होती है जिसका मक्सद सिर्फ़ तबाही होता है और यह सब कुछ खत्म करके ही छोड़ती है। इस भीड़ के हाथ में जो लगता है वो मौत का हथियार बन जाता है। कभी इसके हाथ में पत्थर आ जाते हैं, कभी ईंटें, कभी लाठियां, कभी लोहे की छड़ें और न जाने क्या क्या। ये भीड़ बुज़ुर्ग साधु-संतो को भी नहीं छोड़ती। ऐसी ही एक भीड़ ये थी जिसने दो साधुओं समेत तीन लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी। ऐसी ही एक भीड़ ने नवंबर 2019 में सरकाघाट के एक गांव समाहल में राजदेई नामक वृद्ध महिला के मुंह पर कालिख पोती और उसके गले में जूते लटका कर घसीटा था। ये ऐसी ही भीड़ है जो कोरोना से जूझ रहे डॉक्टरों और स्वास्थय कर्मियों पर हमला करती है। इसी तरह की भीड़ ने सितंबर 2015 में उत्तर प्रदेश के दादरी में मोहम्मद इखलाक पर हमला बोला और उसे मौत के घाट उतार दिया था, अप्रेल 2017 में राजस्थान के अल्वर में 55 वर्षीय पहलू खां को भीड ने मौत के घाट उतार डाला। ऐसी ही एक भीड़ ने जून 2017 में शबे कद्र के मौके पर श्रीनगर की एक जामा मस्जिद के पास तैनात पुलिस अधिकारी अयूब पंडित की पीट-पीट कर हत्या कर डाली। इस देश में भीड़ का शिकार हुए लोगों की फेहरिस्त लंबी और दास्तां खौफनाक व अंतहीन है।
भीड-चाल और भेड़-चाल जैसी होती है, परंतु भेड़-चाल निकसानदेह नहीं होती। भेड-चाल की तरह चल कर भीड़ बहुत बहुत खतरनाक हो जाती है। ये भीड कहीं भी और कभी भी उग्र हो कर उमड़ पड़ती है। अक्सर भीड़ के हाथ में अपने पत्थर नहीं होते। इनके तो सिर्फ़ हाथ होते हैं और पत्थर कोई और इनके हाथों में थमा जाते हैं। ये भीड़ कभी शक व अफ़वाह से उमड़ती है, कभी धर्म की अंधता से उमड़ती है, कभी अंधविश्वास से, और कभी जहालत से उमड़्ती है। और जब इस भीड़ में राजनीतिक रंग मिलता है तो ये और भी तबाहकुन हो जाती है। भीड़ किसी भी रंग से उपजी हो, परंतु इसका परिणाम केवल लाल रंग ही होता है अर्थात परिणाम हिंसा पर जा कर ही खत्म होता है। इस उन्मादी भीड़ की चपेट में अक्सर बेगुनाह लोग आ जाते हैं। इस भीड़ को चाहे राजनीतिक रंग दो या धांर्मिक, शिकार इंसान ही होते हैं और कत्ल इंसानियत का ही होता है।
हम सभ्य समाज समाज में रहते हैं। सभ्य समाज में कायदे-कानून होते हैं। इंसानियत के तकाज़े और मर्यादाएं होती हैं। यदि, सड़कों पर भीड़ फैसला करने लग जाए तो कानून क्यों। यदि भीड ही कानून है, तो कानून के रखवाले क्यों? अगर भीड़ के सामने कानून असहाय व तमाशबीन हैं, तो देश में कानून क्यों? आखिर ये अदालते क्यों? भीड़ मत बनाइए, न ही भीड़ बनिए अन्यथा ये भीड़ किसी को भी लील सकती है, आपको भी।

मीडिया व न्यूज़ एंकरों की सीमा रेखा-- जगदीश बाली

आजकल मीडिया व सियासी गलियारों में पाल घर में हुई संतों की हत्या और रिपब्लिक टीवी न्यूज़ चैनल के सह संस्थापक व मुख्य मालिक अर्नब गोस्वामी से हुइ घंटों की पूछताछ व उन पर हुए हमले को ले कर तू-तू, मैं-मैं का बहसी तूफ़ान अपने उफ़ान पर है। एक बार फ़िर सवाल वही खड़ा है कि मीडिया की कितना स्व्तंत्रता का क्या पैमाना है व विभिन्न चैनलों पर बहस को चला रहे एंकरों के लिए मर्यादाओं की क्या सीमा हैं।  
 कहा जा सकता है कि जो ताकत तोप के गोलों व तलवारों में नहीं, लोकतंत्र में वो ताकत मीडिया में होती है। मीडिया हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। यह एक सजग प्रहरी की तरह देश-प्रदेश की सरकारों, शासकों और प्रशासकों के कार्य पर कड़ी नज़र रखे। मीडिया किसी अमूक विषय, घटना व परिस्थितयों को केवल उजागर और प्रतिपादित ही नहीं करता, बल्कि उनके प्रति आम लोगों की सोच को प्रभावित करता है। इस तरह यह आम राय तैयार करने में अहम भूमिका निभाता है। सजग और जिम्मेदार मीडिया न सरकार की चाटुकारिता करता है न ही अनावश्यक विरोध में खड़ा होता है। आलोचनात्मक मूल्यांकन करना सजग मीडिया और पत्रकारिता की सिद्धांत है। सवाल करना इसका हक भी है और धर्म भी। अगर सवाल नहीं उठाए जाएंगे, तो सुधार, विकास और तरक्की कैसे होगी। अगर मीडिया की ज़ुबान पर ताला लग जाएगा, तो कैसा लोकतंत्र? लोकतंत्र में आवाम की सोच व राय का उतना ही महत्व है जितना मतदान का। आवाम की सोच से राय बनती है और इसी राय के इज़हार से सरकार के फ़ैसले बनते बिगड़ते हैं, सरकारें सत्तारूढ़ होती हैं और सता से उतार भी दी जाती हैं। इस सब में मीडिया की अहम भूमिका होती है।
आज जिस तरह से विभिन्न न्यूज चैनल पर कोई महत्वपूर्ण खबरों व घटनाओं को प्रतिपादित किया जाता है उससे पता चलता है कि पत्रकारिता के मूल्यों का क्षरण हो रहा है। एक ज़माना था जब मीडिया में नैतिक सिद्दातों व समाज के प्रति इसकी जिम्मेदारी को बहुत अहमियत दी जाती थी। कहते हैं एक बार किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने महान पत्रकार राम नाथ गोयनका से उनके एक पत्रकार की तारीफ़ करते हुए कहा कि वह पत्रकार बहुत अच्छी रिपोर्टिंग कर रहा है। गोयनका समझ गए और उन्होंने उस पत्रकार को बर्खास्त कर दिया था। यह स्वतंत्र, निष्पक्ष व साहसी पत्रकार के सिद्दांत और सोच को दर्शाता है। आज न्यूज़ चैनलों पर डिबेटस देखें जाएं, तो सभी ऐसे चिल्ला रहे होते हैं कि यही पता नहीं चलता कौन क्या कह रहा है, क्यों कह रहा है, किसे सुना रहा है और कौन सुन रहा है। एंकर भी कहीं पीछे नहीं रहता। वह एंकर कम और बहस में हिस्सा लेने वाला ज़्यादा लगता है। एंकर का काम अनावश्यक अपनी बात थोंपना व बहस में किसी पक्ष को ले कर कूदना नहीं है। उसका कार्य बहस चलाना है और आवश्यकता पड़ने पर शालीनता से अपने सवाल उठाना है। परंतु न्यूज़ चैनलों पर कोई एंकर सरकार की शान में राग दरबारी करता हुआ दिखता है तो कोई सरकार के कामों को काला कर दिखाने में जुटा रहता है। इस सारी प्रक्रिया में दर्शक असमंजस में पड़ जाता है और कई बार वह भ्रमित भी हो जाता है। कोरोना को ले कर तबलीगियों का रवैया, कोरोना योद्धाओं पर हमला, पाल घर में संतों की हत्या, पुलवामा में आतंकवादी हमला, बालाकोट में भारत का एयर स्ट्राइक जैसे मामलों के संबंध में विभिन्न चैनलों पर जिस तरह से एंकरों ने वाद-विवाद, उससे न केवल मीडिया की नकारात्मक छवि सामने आयी बल्कि देश की जनता भी भ्रमित ही हुई है। एंकर कई बार इतने स्व्तंत्र हो जाते हैं कि हद हो जाती है। लिहाज़ा सवाल उठ रहे हैं कि आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मायने क्या है और इसकी हदें क्या हैं। एंकरों और रिपोर्टरों को क्या कुछ भी कहने या प्रसारण करने का अनहद अधिकार है? क्या उन्हें पारदर्शिता के नाम पर देश की सुरक्षा को ताक पर रखा जा सकता है या क्या उन्हें किसी का अपमान करने का अधिकार है? अगर कोई हदों को पार करता है तो क्या उसे लताड़ लगनी चाहिए या उस पर कोई प्रतिबंध लगना चाहिए?
 निश्चित रूप से नहीं। क्योंकि अभिव्यक्ति की आज़ादी किसी भी लोकतंत्र की आत्मा होती है। यदि मीडिया सरकार की उचित आलोचना नहीं करेगा, तो ऐसी सरकार तो तानाशाह बन कर बैठ जाएगी। हम जर्मनी के उस नाज़िबाद में नहीं रहते है जिसमें हर वो अखबार, पत्रिकाएं, किताब, कलाकृतियां, संगीत, फ़िल्म, रेडियो प्रतिबंधित कर दिये गए थे जो नाज़ियों को नपसंद थे। इन किताबों में अल्बर्ट आइन्स्टीन, साइमन फ़्रूड, अर्नेस्ट हेमिंग्वे और हैलन कैलर जैसे लेखकों की पुस्तकें भी शामिल है। भारत में 1975-77 के 21 महीने के आपात काल को भी काला युग कहा जाता है। ये सारे उदाहरण इतिहास के वो काले पन्ने हैं जो अभिव्यक्ति की घुटन को दर्शाते हैं।
 मीडिया को स्वतंत्र तो होना ही चाहिए और उसे सवाल करने का पूरा हक है। मैं यहां केवल मीडिया या एंकर द्वारा उठाए जाने वाले सवालों की बात कर रह हूं। घ्यान रहे उसके द्वारा किसी का मान मर्दन आपतिजनक है, दंडनीय हो सकता है और ये अलग विषय है। एंकरों द्वारा उठाए गए सवालों को सरकार या प्रशासन द्वारा दबाने का प्रयास उचित नहीं। यदि आज एक अर्नब के सवालों को दवाया जाएगा, कल ओम कश्यप के, परसों सरदाना के, चौथ देवगन के और कभी हो सकता है रवीश के सवालों को भी दबा दिया जाए। तथापि मीडिया व एंकरों को स्वयं समझना है कि उसकी आज़ादी की सीमाएं भी है और देश व समाज के प्रति कर्तब्य भी। अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब आलोचना हो सकता है, गाली नहीं। स्टूडियो मैं बैठकर कोई भी एंकर या रिपोर्टर होने की ठसक में अभिवयक्ति की आज़ादी का गलत इस्तेमाल नहीं कर सकता। न ही सता के गलियारो में कुर्सियों की हेकड़ी में कोई सत्ताधीश या हकूमत इस आज़ादी को रौंद सकते हैं। चौथा स्तंभ मीडिया देश का सजग प्रहरी है, परन्तु इसे स्वत: ही अपनी सीमाओं और जिम्मेदारियों का आभास होना चाहिए।

JAGDISH BALI

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बढता ताप घटता पानी कटते जंगल: कैसे होगा मानव मंगल --जगदीश बाली

जांबिया के लुसाका में स्थित चिड़िया घर के एक पिंजरे के बाहर नोटिस लगा है जिसमे लिखा है- दुनियां का सबसे ख़तरनाक जानवर। पिंजरे में कोई जानवर नहीं, बल्कि एक दर्पण है जिसमें आप अपना प्रतिबिंब देख सकते हैं। वास्तव में ये नोटिस मनुष्य द्वारा पृथ्वी और प्रकृति के साथ किए गए सलूक पर तीखा व्यंग्य है। खुदा ने जब इस सृष्टि की रचना की, तो इस पृथ्वी को बहुत खूबसूरत और दिलकश बनाया। तपता सूरज, ठंडक प्रदान करता चंदा मामा, टिमटिमाते सितारे, ये बादल, वो इंद्रधनुष, बर्फ़ का ताज पहने पहाड़, शानदार हरे-भरे मैदान, मनोरम घाटियां शानदार हरे भरे मैदान, मनोरम घाटियां, सपाट मरुस्थल, बिहड़ वन, पहाड़ी से गिरते संगीतमय झरने, सांपनुमा दरिया, अथाह सागर, मन को पुलकित करने वाली मुस्कुराते फूलों की ख़ुशबू, वन में विचरण करते खग-मृग, नीले आकाश में उड़ते-कूजते पंछी और हम मानव। सचमुच ईश्वर ने मनुष्य के लिए धरती को कितना सुंदर बनाया। परन्तु हमने अपने इस निवास स्थान को इस कदर बिगाड़ दिया है कि आज हमारी धरती एक मरीज़ की तरह लगती है। इस पृथ्वी को बीमार करने में मनुष्य का ही हाथ रहा है। अपनी धरती मा की देख-रेख में मनुष्य एक अकुशल प्रबंधक साबित हुआ है।
 घातांक तेज़ी से बढती हुई आबादी की मांग को पूरा करने के लिए और अपने स्वार्थ के लिए मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों का बेतरतीबी से दोहन किया है। संसार की बढ़ती को देखते हुए मानव की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक धरती और चाहिए, परन्तु हमें नालूम है इसी धरती पर रह कर गुज़ारा करना होगा। जितनी तेज़ी से प्राकृतिक संसाधन समाप्त हो रहे हैं, उतनी तेज़ी से उनकी भरपाई नहीं की जा सकती। जल्दी ही ये संसाधन मानव के लिए कम पड़ जाएंगे। 
मतस्य पुराण में ऋषि मनीषा कहती हैं- दशपुत्रसमो द्रुमः अर्थात एक पेड़ दस पुत्रों के समान है। परन्तु हमने धरती मा के रक्षक कहे जाने वाले वनों का तीव्र गति से नाश किया है। अपने आवास के लिए, इंधन के लिए और चारागाहों के लिए वनों को काटा गया। इसके अलावा भी वनों का कटान किया जाता रहा। वनों को बचाने के लिए कानून का जंगल तो उग आया, परन्तु वृक्ष कहीं-कहीं दिखाई देते हैं। गौरतलब है कि एक पेड़ तीन व्यक्तियों के लिए जीवन प्रदायिनी ऑकसीज़न देता है। विडंबना है कि पहले मनुष्य पेड़ काटता है, उससे काग़ज़ बनाता है और उसी काग़ज़ से पोस्टर बना कर बड़े-बड़े और मोटे-मोटे अक्षरों में लुभावना नारा लिखता है- वनों को बचाना है। अंदाज़न एक टन नया कागज़ बनाने में 20 से अधिक बड़े पेड़ों को काटना पड़ता है। प्रतिवर्ष 18 मिलियन ऐकड़ वन नष्ट कर दिए जाते हैं जिस वजह से 12 से 18 प्रतिशत ग्रीन हॉउस गैस वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं। वनों के कटाव से कई वन्य प्राणियों की प्रजातियां भी नष्ट हो रही हैं। भूमि कटाव और भूमंडलीय तापमान का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।
 मुझे याद है बचपन में जब हम घर से बाहर इधर-उधर घूमने निकलते थे, तो जगह-जगह पानी के झरने, चश्में, तालाब व छोटी-छोटी झीलें अक्सर मिल जाया करते थे। परन्तु आज ऐसा नहीं रहा। मालूम नहीं ये जल स्रोत कहां गायब हो गए। तातपर्य यह कि पानी की मात्रा घटती जा रही है। नलों में पानी निर्धारित समय के लिए आता है और कई बार तो कई दिनों तक नल की ओर टकटकी लगाए देखना पड़ता है कि शायद आज पानी आएगा। कई बार तो आम नल से पानी भरने के लिए लोगों को झगड़ते हुए देखा जा सकता है। जल्द ही हमें पानी की राशनिंग करनी पड़ेगी है। ऐसा समय भी आएगा कि पानी के लिए युद्ध होगा। गोदावरी, कावेरी व नर्मदा नदी जल बंट्वारा जैसे जल विवाद तो हमारे देश में चल ही रहे हैं। पानी के स्रोतों का समाप्त होना बहुत गंभीर खतरा है क्योंकि पानी का कोई विकल्प नहीं और पानी नहीं तो कुछ भी नहीं। पीने के लिए पानी नहीं, तो जीवन खत्म और अन्न उगाने के लिए पानी नहीं, तो भी जीवन खत्म। पानी कम होने के साथ-साथ यह प्रदूषित भी होता जा रहा है। नदियों-नालों के आस-पास रहने वाले लोग कचरा और गंदगी इनमें बहा देते हैं, जिससे ये नदियां-नाले ज़हर के चलते-फिरते भंडार बनते जा रहे हैं। ये किसी से छिपा नहीं कि वो गंगा, जिस की पवित्रता की सौगंध हम खाते हैं, कितनी मैली हो गई है। फ़ैक्टरियों से निकलने वाला कूड़ा-कचरा भी इन नदियों के आगोश में समा जाता है। उस पानी को जो साफ समझ कर पीएगा, नहाएगा, वो बिमारियों का शिकार तो होगा ही।
वातावरण में कार्बन व ग्रीन हाउस गैस की मात्रा बढने से विश्व का तापमान बढ़ रहा है। पावर स्टेशनों व औद्योगिक इकाइयों, गाड़ियों, जीवाश्म इंधन, बायो गैस, प्लास्टिक व कचरे से निकलने वाला धुआं हमारे भविष्य को भी अंधेरा कर रहा है। पिछले 100 वर्षों में सहारा का तापमान 10 प्रतिशत बढ़ चुका है। वैज्ञानिकों के अनुसार 21वीं शताब्दी में पृथ्वी का तापमान 3 डिग्री से 8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। कई हिस्सों में बर्फ की चादरें पिघल जाएंगी, समुद्र का जल स्तर बढ़ने के साथ दुनिया के कई हिस्से डूब जाएँगे। भूमंडलीय तापमान से होने वाली तबाही किसी विश्वयुद्ध या क्षुद्र ग्रह के पृथ्वी से टकराने से होने वाली तबाही से भी ज़्यादा होगी। आने वाले दिनों में सूखे व बाढ़ की घट्नाएं बढ़ेगी और मौसम का मिज़ाज पूरी तरह बदला हुआ दिखेगा।
तो समझ लीजिए, मान लीजिए कि जहां हम रह रहे हैं वो जगह कितनी विस्फोटक है। हमें इस धरती को अपने बाल-बच्चों के लिए एक बेहतर जगह बनाना है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए एक झुलसी हुई मरीज़ धरती देना चाहते हैं या फिर हरी-भरी पुष्ट धरती। ऋग्वेद में भी कहा गया है- उप सर्प मातरं भूमिम् अर्थात भूमि की सेवा करो। इसका अंधाधुंध दोहन नहीं बल्कि इसका पोषण करो। इस धरती को हमें वन लगा कर हरा भरा बनाना होगा। जीवनामृत पानी को ज़ाया न जानें दें। प्राकृतिक संसाधनों का मितव्ययता से इस्तेमाल करना पड़ेगा। गाड़ियों का विवेकपूर्ण प्रयोग करना चाहिए। कूड़ा करकट फ़ेंकने वालों व वन काटुओं की को नज़र अंदाज़ करना भारी पड़ेगा। अथर्ववेद के भूमि सूक्त के मत्रांश में कहा गया है- माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या अर्थात धरती मा के समान है और मैं इसका पुत्र हूं। इस मत्रांश को जीवन में अपनाने की आवश्यकता है।

कैसे बढ़े शिक्षा की गुणवत्‍ता : एक शिक्षक का दृष्टिकोण - डॉ मामराज पुंडीर ( विशेष कार्य अधिकारी शिक्षा मंत्री , हिमाचल सरकार)

शिक्षक समाज की सर्वाधिक संवदेनशील इकाई है। शिक्षको को समाज में जो इज्जत, मान सम्मान मिलती थी वह समय रहते बदलती गई।विश्व गुरु कहलाने वाला और गुरु नगरी कहलाने वाला हमारा यह देश जिसमे भगवान राम के गुरु वशिष्ठ, भगवान् कृष्णा के गुरु सांदीपनी, और द्रोणाचार्य और चाणक्य जेसे शिक्षको ने जन्म लिया था और विश्व  विख्यात विभुतियों को निखारा था। उस समय गुरुओं को गुरु का सम्मान और आदर मिलता था। गुरु भी गुरु की भूमिका  निभाते रहें थे। राजाओं ने भी अपने दरबार में गुरुओं के लिए उच्चित स्थान के साथ साथ उचित्त सम्मान की व्यवस्था होती थी। राजा के दरबार में अगर गुरु का आना हो जाएँ  तो राजा उसे  अपना सोभाग्य मानते थे । गुरुओं ने भी गुरुकुल में अपने शिष्य को निहारने का काम बखूभी निभाया।
आधुनिकता के इस युग में  समय ने ऐसी करवट ली और गुरु गुरु से अध्यापक, फिर शिक्षक और अब मास्टर हो गये। और सम्मान और गरिमा दोनों को खोता देख अध्यापको ने भी समाज से समझोता कर लिया।

समाज ने भी अध्यापको को कोसने और गरिमा गिराने का कोई भी मौका नही जाने दिया। जब भी मौका मिला, सभी ने चाहे वह अधिकारी हो या नेता ,चाहे वह कर्मचारी हो या क्लर्क, सभी ने सिर्फ मौके के हिसाब से गुरुजनों को कोसने का काम किया। हालात यह हो गये कि अपने सम्मान को बचाने में लगे गुरुओं को समाज ने अपने अपने तरीके से कोसना शुरू कर दिया । नेता और अधिकारी यह भूल गये कि शायद उनको यहाँ तक पहुचाने में कुछ योगदान उस अध्यापक का भी है जिसे कोसने मे उसे आनन्द आता है ।
देश के कई राज्यों मे तबादला निति लागु करके एतिहासिक फेसला लिया है । देश के बाकि राज्य जिसमे हिमाचल प्रदेश भी शामिल है इस दिशा में अग्रसर है ।तबादला कानून में हिमाचल कोई फेसला कर जाएँ इसकी सभावना कम ही लगती है।क्योकि राज नेता और अधिकारी इसको लागु करवाने के लिए उत्सुक नही, क्योकि अधिकारियो और नेताओं का कोई न कोई विभाग मे सेवाए दे रहा होता है। कुछ संगठनो के पदाधिकारी भी इसका विरोध करेंगे । वजय साफ़ है शहर से लगाओ उनको विरोध के लिए मजबूर करता है। और यह सिर्फ हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य में दस प्रतिशत से ज्यादा नही। परन्तु मेरा यह मानना है कि अपने खोये हुए सम्मान के लिए सभी शिक्षको को इसका स्वागत करना होंगा और तबादला होने या करवाने में जलील होने से बचना होंगा ।
 
शिक्षक  अपना काम ठीक तरह से नहीं करते- यह आरोप तो सर्वत्र लगाया जाता है। लेकिन यह विचार कोई नहीं करता कि उसे पढ़ाने क्यों नहीं दिया जाता ? आए दिन गैर-शैक्षिक कार्यों में इस्तेमाल करता प्रशासन, शिक्षकों की शैक्षिक सोच को, शैक्षिक कार्यक्रमों को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है। बच्चों को पढ़ाना-सिखाना सरल नहीं होता और न ही बच्चे फाईल होते हैं। प्रशासनिक कार्यालय और अधिकारीगण शिक्षा और शिक्षकों की लगातार उपेक्षा करते हैं। उन्हें काम भी नहीं करने देते। इसी कारण स्कूली शिक्षा में अपेक्षित सुधार सम्भव नहीं हो पा रहा है।

स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए हमें स्कूलों के बारे में अपनी परम्परागत राय को बदलना होगा। अभी स्कूलों को कार्यालय समझकर, शिक्षकों को प्रतिदिन अनेक प्रकार की डाक बनाने और आँकड़े देने के लिए मजबूर किया जाता है। इससे बच्चों की पढ़ाई में व्यवधान होता रहता है। बच्चे अपने शिक्षकों से सतत् जुड़े रहना चाहते हैं, विशेषकर प्राथमिक स्तर पर। अत: स्कूलों को कार्यालयीन कामकाज से वास्तव में मुक्त कर सभी प्रदेशो में ज्यादा से ज्यादा प्रभावी शिक्षण संस्थान को  बनाया जाना चाहिए।
 
विद्यालय बनाम सामुदायिक शिक्षण केन्द्र

हमारे शासकीय विद्यालय बाल शिक्षण (6-14 आयु वर्ग के बच्चों) के लिए कार्य कर रहे हैं। शिशु शिक्षण के लिए संचालित आँगनवाड़ी और प्रौढ़ शिक्षा के लिए कार्यरत सतत् शिक्षा केन्द्रों का सम्बंध विद्यालय से कहने भर को है। वास्तव में इन सभी के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। यदि इन तीनों एजेंसियों को एकीकृत कर दिया जाए तो 3 से 50 वर्ष तक के लिए शिक्षण की बेहतर व्यवस्था सम्भव है|
यह भी जरूरी है कि आँगनवाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षक और सतत शिक्षा केन्द्रों के प्रेरक को एक साथ मिल-बैठकर कार्य करने के लिए तैयार किया जाए। यदि तीनों एजेन्सी एकीकृत स्वरूप में कार्य करने लगे तो सम्भव है स्कूल की कार्यावधि 12 से 14 घण्टे प्रतिदिन तक हो जाए। साथ ही समुदाय के सभी वर्गों के लिए स्कूल में प्रवेश और सीखने के अवसर बढ़ सकते हैं।
अभी अधिकांश स्कूल अन्य सरकारी कार्यालयों की तर्ज पर  10 से 5 की अवधि में ही खुलते हैं। इस कारण से रोजगार में जुटे परिवारों के बच्चों के लिए वे अनुपयोगी सिध्द हो रहे हैं। स्कूल की समयावधि सरकारी नियंत्रण में होने के कारण बच्चों की उपस्थिति और सीखने का समय कमतर होता जा रहा है। स्कूली उम्र पार कर चुके किशोरों, युवाओं, महिलाओं और कामकाजी लोगों के लिए स्कूल के दरवाजे एक तरह से बन्द ही हैं। विद्यालय समाज की लघुतम इकाई के रूप में ''सामाजिक शिक्षण केन्द्र'' के रूप में कार्य कर सकते हैं। इस परिकल्पना को साकार करने की दिशा में पहल किए जाने का दायित्व स्थानीय ''पालक शिक्षक संघ'' पूरा कर सकते हैं। अगर समाज की जरूरत के चलते चिकित्सालय और थाने दिन-रात खुले रह सकते हैं, तो यह भी उतना ही आवश्यक है कि विद्यालय कम-से-कम 12-16 घण्टे जरूर खुलें।
 
शिक्षक-छात्र अनुपात ठीक हो
शैक्षणिक सुधार में शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। पाठयपुस्तकों और पाठयक्रम के अनुरूप प्रभावी शिक्षण, शिक्षकों की योग्यता, सक्रियता और पढ़ाने के कौशल पर निर्भर है। एक शिक्षक, एक साथ कितनी कक्षाओं के कितने बच्चों को भली-भाँति पढ़ा सकेगा, इस बारे में गम्भीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है।
आदर्श रूप में एक शिक्षक अधिकतम 20 बच्चों को ही ठीक प्रकार पढ़ा सकता है। वह भी तब, जब वे भी एक समान स्तर के हों। अभी व्यवस्था यह है कि एक शिक्षक 40 बच्चों को (और वे भी अलग-अलग स्तरों के हैं) पढ़ाएगा। अनेक स्कूलों में तो 70-80 से भी अधिक बच्चों को पढ़ाना पड़ रहा है। ऐसे में शिक्षक मात्र बच्चों को घेरकर ही रख पाते हैं पढ़ाई तो सम्भव ही नहीं। शिक्षक बच्चों को पढ़ा भी पाएँ, इस हेतु शिक्षक-छात्र अनुपात को व्यवहारिक बनाना होगा।
 
प्रशिक्षण, शिक्षण और परीक्षण
स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए शिक्षण विधियों, प्रशिक्षण और परीक्षण की विधियों में भी सुधार करने की जरूरत है। अभी शिक्षण की विधियाँ राज्य स्तर से तय की जाती हैं। कक्षागत शिक्षण कौशलों को या तो नकार दिया जाता है या उन्हें परिस्थितिजन्य मान लिया जाता है।
अच्छे प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण का दायित्व कर्तव्यनिष्ठ, योग्य और क्षमतावान प्रशिक्षकों को सौंपा जाना चाहिए। शिक्षकों के प्रशिक्षण को प्रभावी बनाने, शिक्षण में नवाचारी पध्दतियाँ विकसित करने सहित परीक्षण (मूल्यांकन) की व्यापक प्रविधियाँ तय कर उन्हें व्यवहारिक स्वरूप में लागू करने की दिशा में कारगर कदम उठाने की दृष्टि से यह आवश्यक है कि हर प्रदेश में एक ''शैक्षिक संदर्भ एवं स्त्रोत केन्द्र'' विकसित किया जाए।
 
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मूलक परियोजनाएँ
शिक्षा के क्षेत्र में अनेक संस्थाएँ कार्यरत हैं। रोजगार और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी शासकीय स्तर पर परियोजनाएँ और कार्यक्रम लागू किए गए हैं। मानव विकास के बुनियादी सूचकांक होते हुए भी इनमें तालमेल न होने के कारण इनकी गति अपेक्षित नहीं है। धन की गरीबी से ज्ञान की गरीबी का विशेष सम्बंध है। ग्रामीण दूरस्थ अँचलों में ज्ञान की गरीबी पसरी हुई है। जानकारी के अभाव में वे संसाधनों का उपयोग नहीं कर पाते। अनेक परियोजनाओं के बावजूद उनकी प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक चिकित्सा और बुनियादी रोजगार की प्रक्रियाएँ बाधित होती हैं। अब समय आ गया है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए लागू परियोजनाओं को समेकित ढ़ंग से किसी सुनिश्चित क्षेत्र में लागू कर परिणामों की समीक्षा की जाए। अच्छे परिणाम आने पर उन्हें पूरे देश भर में लागू किया जाए। इस प्रकार हम अपने संसाधनों और मानवीय क्षमताओं का बेहतर उपयोग कर सकेंगे जिससे शिक्षा के गुणात्मक विकास की संभावनाएँ बढ़ेंगीं।
 
पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें
अभी वास्तव में यह ठीक प्रकार तय ही नहीं है कि किस आयु वर्ग के बच्चों को कितना सिखाया जा सकता है और सिखाने के लिए न्यूनतम कितने साधनों और सुविधाओं की आवश्यकता होगी। नई शिक्षा नीति 1986 लागू होने के बाद न्यूनतम अधिगम स्तरों को आधार मानकर पाठ्यपुस्तकें और पाठ्यक्रम तो लगातार बदले गए हैं, लेकिन उनके अनुरूप सुविधाओं और साधनों की पूर्ति ठीक से नहीं की गई है। यह सोच भी बेहद खतरनाक है कि पाठ्यपुस्तकों के जरिए हम भाषायी एवं गणितीय कौशलों और पर्यावरणीय ज्ञान को ठीक प्रकार विकसित कर सकते हैं। यथार्थ में पाठ्यपुस्तकें पढ़ाई का एक छोटा साधन मात्र होती हैं साध्य नहीं। कक्षाओं पर केन्द्रित पाठयपुस्तकों और पाठ्यक्रम को श्रेणीबध्द रूप में निर्धारित करना भी खतरनाक है। बच्चों की सीखने की क्षमता पर उनके पारिवारिक और सामाजिक वातावरण का भी विशेष प्रभाव पड़ता है, अत: सभी क्षेत्रों में एक समान पाठ्यक्रम और एक जैसी पाठ्यपुस्तकें लागू करना बच्चों के साथ नाइन्साफी है।
 
शैक्षिक उद्देश्य
स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए  हमें वर्तमान शैक्षिक उद्देश्यों को भी पुनरीक्षित करना होगा। शिक्षा, महज परीक्षा पास करने या नौकरी/रोजगार पाने का साधन नहीं है। शिक्षा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास, अन्तर्निहित क्षमताओं के विकास करने और स्वथ्य जीवन निर्माण के लिए भी जरूरी है। शिक्षा प्रत्येक बच्चे को श्रेष्ठ इंसान बनने की ओर प्रवृत्त करे, तभी वह सार्थक सिध्द हो सकती है। कहा भी गया है ''सा विद्या या विमुक्तये''। अभी पढ़े-लिखे और गैर पढ़े-लिखे व्यक्ति के आचरण और चरित्र में कोई खास अन्तर दिखाई नहीं देता। उल्टे पढ़-लिख लेने के बाद तो व्यक्ति श्रम से जी चुराने लगता है और अनेक प्रकार के दुराचरणों में लिप्त हो जाता है। यह स्थिति एक तरह से हमारी वर्तमान शैक्षिक पध्दति की असफलता सिध्द करती है। अतः यह जरूरी है कि शिक्षा के उद्देश्यों को सामयिक रूप से परिभाषित कर पुनरीक्षित किया जाए।
 
शिक्षकों को ''शिक्षक'' के रूप में अवसर मिले
समान कार्य के लिए समान कार्य परिस्थितियाँ और समान वेतन की अनुशंसा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में और मानव अधिकार घोषणा पत्र के अनुच्छेद 21, 22, और 23 में वर्णित होते हुए भी नाना नामधारी शिक्षक मौजूद हैं। एक ही विद्यालय में अनेक प्रकार के शिक्षकों के पदस्थ रहते सभी के मन में घोषित-अघोषित तनावों के कारण पढ़ाई में व्यवधान हो रहा है। इस परिस्थिति को गम्भीरता से समझे बगैर और परिस्थितियों में सुधार किए बगैर भला शिक्षण में सुधार कैसे होगा? शासन को सभी शिक्षण संस्थाओं में कार्यरत शिक्षकों के लिए एक समान कार्यनीति, समान पदनाम, समान वेतनमान देने की नीति तय कर एक निश्चित कार्यावधि के बाद पदोन्नति देने का भी ऐलान करना चाहिए।
 

श्रेष्ठतम शैक्षिक कार्यकर्ता
शैक्षिक परिवर्तन के लिए शिक्षकों का मनोबल बनाए रखने और उत्साहपूर्वक कार्य करने की इच्छाशक्ति पैदा करने के लिए संगठित प्रयास करने होंगे। अभी शिक्षा व्यवस्था में बालकों और पालकों की भागीदारी न्यूनतम है, इसलिए सभी शैक्षिक कार्यक्रम सफल नहीं हो पाते हैं। स्कूलों में भी जिस प्रकार समर्पित स्वयंसेवकों की आवश्यकता है, वे नहीं हैं। अत: यह आवश्यक है कि श्रेष्ठतम शैक्षिक कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की जानी चाहिए।
 
शिक्षकों का मनोबल बढ़ाया जाए
समूची दुनिया के सभी विकसित और विकासशील देशों में प्राथमिक शालाओं के शिक्षकों को आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और प्रशासनिक दृष्टि से श्रेष्ठ माना जाता है। साथ ही ऐसी शिक्षा नीति बनाई जाती है जिसमें उनका मनोबल सदैव ऊँचा बना रहे। जब तक अनुभव जन्य ज्ञान, और कौशलों को महत्व नहीं दिया जाएगा तब तक ''बालकेन्द्रित शिक्षण'' की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती है। बाल केन्द्रित शिक्षण के लिए कार्यरत शिक्षकों की दक्षता और मनोबल बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।
यह आवश्यक है कि शिक्षकों को उनके व्यक्तित्व विकास की प्रक्रियाओं सहित ऐसे प्रशिक्षण संस्थानों में भेजा जाए जहाँ उन्हें अपने अन्दर झाँकने ,कुछ बेहतर कर गुजरने की प्रेरणा मिल सके। इस प्रशिक्षण उपरान्त उन्हें कार्यरत स्थलों पर ''ऑन द जॉब सपोर्ट'' के रूप में ऐसे सहयोगी दिए जाएँ जो उनकी वास्तविक मदद करें। किसी ऐसी संस्था को इस दिशा में काम करने की जरूरत है जो सामाजिक बदलाव के लिए व्यापक दूरदृष्टि और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ काम करने के लिए सहमत हो और उसके पास स्वयं के संसाधन भी उपलब्ध हों।
आज जरूरत इस बात की है कि किसी प्रकार पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया में परिवर्तन लाने के लिए विद्यालय प्रशासन, शिक्षकों और शैक्षिक कार्यक्रमों में तालमेल बनाया जाए। समुदाय की शैक्षिक आवश्यकताओं को पहचान कर उनकी जरूरतों के अनुरूप निर्णय लेते हुए ऐसा वातावरण बनाने की आवश्यकता है जिसमें व्यवसायिक योग्यता में वृध्दि सुनिश्चित हो। शिक्षा के प्रशासन एवं प्रबन्धन में उत्तरदायी भूमिका निभाने वाले संस्था प्रधानों की नियुक्ति और प्रशिक्षण हेतु शिक्षा विभाग एवं शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे अन्य संगठनों को शीघ्र कारगर कदम उठाना चाहिए। संस्था प्रधानों की भूमिका को सशक्त बनाए बगैर शिक्षा में सुधार की सम्भावनाएँ अत्यन्त क्षीण रहेंगी। हिमाचल प्रदेश में अध्यापको को खास टूर से राजनितिक गलियारों में मास्टर शब्दों से संबोधन से अध्यापक को समाज हीन भावना से देखता है। इस प्रकार के प्रयोगों से राजनेताओं और अधिकारीयों को बचना होंगा।
कहते हेई जिस राज्य  में गुरु जनों का आदर नही होता वह राज्य  कभी उन्नत नही होता।
 
प्रशासनिक एवं प्रबन्धकीय व्यवस्थागत सुधार
शिक्षा प्रशासन की यह नियति बन गई है कि इसमें उच्च शिक्षा स्तर पर भी स्थायित्व नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर लागू राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 और कार्ययोजना 1992 में स्वीकृत अखिल भारतीय शिक्षा सेवा की स्थापना आज तक नहीं हो पाई है। लगभग हर स्तर पर निर्णायक पदों पर नियुक्त प्रशासनिक सेवा के अधिकारी शिक्षा क्षेत्र में आ रही गिरावट और असफलता के लिए उत्तरदायी नहीं माने जाते। हाँ, किसी छोटी-सी सफलता का श्रेय अवश्य हासिल करते नजर आते हैं। शिक्षा में सुधार के लिए कार्यरत शिक्षकों को समर्थन देने की दृष्टि से यह अत्यंत आवश्यक है कि शिक्षा के प्रबन्धन और प्रशासन को सुधारा जाए। म.प्र. शासन द्वारा वर्ष 2003 में गठित ''स्पेशल टास्क फोर्स'' की अनुशंसाओं को लागू किए जाने की भी आज महती आवश्यकता है जो एक दस्तावेज में सिमट कर रह गई हैं। म.प्र. देशभर में सर्वप्रथम जन शिक्षा अधिनियम तैयार कर लागू करने वाले प्रदेश के रूप में है। क्रियान्वयन के स्तर पर जरूर अनेक कार्य अभी शेष हैं जिसमें प्रमुख कार्य सभी स्तरों पर कार्यरत शिक्षा केन्द्रों के संचालन हेतु मैनुअल (संचालन मार्गदर्शिकाओं) का सृजन और उन्हें लागू करना है, ताकि कार्यरत स्टाफ बेहतर प्रदर्शन कर सके। प्रदेश के सभी जनशिक्षा केन्द्रों को प्रबन्धन और प्रशासन के प्रति उत्तरदायी भूमिका सौंपते हुए जनशिक्षा केन्द्र प्रभारी को आहरण वितरण अधिकार दिए जाने चाहिए। यह अत्यंत आवश्यक है कि समग्रत: शिक्षा व्यवस्था को नियंत्रित किए जाने हेतु राज्य की शिक्षा नीति तैयार की जानी चाहिए। कार्यरत शिक्षकों की दक्षता का सम्मान और उनकी कार्यदक्षता का उपयोग किए जाने की दृष्टि से विभागीय दक्षता परीक्षा का आयोजन कर सभी को प्रन्नोत किया जाना चाहिए। अंतत: शैक्षिक सुधार के लिए अब हमें विचार करने की बजाय कर्तव्य की ओर बढ़ना होगा।  
आज शिक्षा के क्षेत्र में वास्तविक सुधार की दृष्टि से शीघ्र सार्थक कदम उठाते हुए हमें ऐसी शिक्षण पध्दति और कार्यक्रम विकसित करने होंगे जो बच्चों के मन में श्रम के प्रति निष्ठा पैदा करें। समग्रत: एक ऐसा प्रभावी शैक्षिक कार्यक्रम बनाना होगा जिसमें –
1. पाठ्यक्रम लचीला और गतिविधि आधारित हो, साथ ही बच्चों की ग्रहण क्षमता के अनुरूप भी।
2. कक्षागत पाठ्य योजनाएँ, स्वयं शिक्षकों द्वारा तैयार की जाएँ और उन्हें पूरा किया जाए।
3. राज्य की शिक्षा नीति निर्धारण में शिक्षाविदों और कार्यरत शिक्षकों को वास्तव में सहभागी बना कर सभी के विचारों को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाए।
4. जन भागीदारी समितियाँ (पालक शिक्षक संघ) प्रबन्धन का दायित्व स्वीकारें - शैक्षिक प्रशासन तंत्र भी शालाओं में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें। शिक्षण का अधिकार शिक्षकों को वास्तव में सौंपा जाए।
5. शिक्षण विधियों में परिवर्तन करने का अधिकार शिक्षकों को हो, प्रशासनिक अधिकारियों को नहीं।
6. कक्षाओं में शिक्षक-छात्र अनुपात ठीक किया जाए, साथ ही पर्याप्त मात्रा में शैक्षिक सामग्री की पूर्ति और शिक्षकों की भर्ती की जाए।
7. पाठ्यपुस्तकों की रचना स्थापित रचनाकारों की बजाय शिक्षकों और शिक्षा विशेषज्ञों के माध्यम से की जानी चाहिए, जो शैक्षिक दृष्टि से उपयुक्त हो।
8. शैक्षिक सुधारों को लागू करने में संस्था प्रधानों और शिक्षकों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाए।
9. शिक्षकों के सहयोग हेतु ''राज्य शिक्षक सन्दर्भ और स्त्रोत केन्द्र'' स्थापित किए जाएँ।
10.  विद्यालयों को सामुदायिक शिक्षण के लिए उत्तरदायी बनाया जाए।
11. सभी राज्यों में तबादला निति को लागु करना चाहिए।

       विचारो से हो सकता है कोई सहमत नही होंगा, परन्तु मेरे निजी विचारो को स्वीकार करे ।

Dr Mam Raj Pundir
C/O Correstophen estate set No 35
Nera IGMC Shimla
9418890000