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अगर शब्द न होते... जगदीश बाली

 ईश्वर ने इंसान बनाया और उसे ज़ुबान दी, ज़ुबान के साथ ऐसा नायाब स्वरयंत्र दिया दिया जिसका इस्तेमाल वह बोलने के लिए करता है। बोलने के लिए शब्द चाहिए। अपने ख़्यालों के इज़हार के लिए भी शब्द चाहिए। अगर शब्द न होते तो हम अपने ख्यालों को कैसे व्यक्त करते, कैसे कह पाते, कैसे लिख पाते। शब्द न होते तो किताबें न होती और न ही कुछ पढ़ने पढ़ाने को होता। हम आज की तरह एस.एम.एस न कर पाते, न फ़ैसबुक पर कोई अपनी बात लिख कर स्टेटस डाल पाते। न ही कोई वट्सऐप पर चैट कर पाता, न कोई ट्वीट कर कुछ कह पाता। कुछ आड़ी तिरछी लकीरें होतीं और तस्वीरें होतीं। हम केवल फ़ोटो अपलोड कर पाते। हम इतनी सुगमता से पुराने यार दोस्तों को न खोज पाते। तब कुछ याद रह जाता और बहुत कुछ भूल जाता। कुछ भूली-बिसरी बातें शेष रह जाती। ये यादों के अफ़साने कुछ ही समय बाद दफ़्न हो जाते। कुछ अफ़सानों की कबरें होतीं तो कुछ कबरों के अफ़साने होते। ज़रा कल्पना कीजिए! अगर शब्द न होते तो इंसानों की दुनिया कैसी होती।  
 शब्द न होते, तो हम अपनी बात कैसे कह पाते? हमारी भाषा कैसी होती? हम अपने सुख, दुख, खुशी, उत्साह, न्राराज़गी व गुस्से को कैसे व्यक्त करते? हमारी भाषा भी शायद वनों में विचरण करने वाले खग-मृगों की तरह होती। हमारी भाषा पालतु जन्तुओं की तरह होती और आकाश में विचरण करते पंछियों की तरह होती। हम अगर गुस्सा करते, तो कुत्ते की तरह गुर्राते और चिल्लाना चाहते तो शायद उसी की तरह भौंकते। खुश होते तो इसका इज़हार शायद घोड़े की तरह हिनहिना कर करते या फ़िर गधे की तरह ढेंचु ढेंचु करते। ऐसे में इज़हारे मोहब्ब्त कैसे करते? शायद आंखों के ईशारे से ही सब कुछ समझना पड़ता और दिल जीतने का ये हुनर भी सीखना पड़ता क्योंकि न खत लिख पाते न वैलेंटाइन डे पर ग्रीटिंग कार्ड दे पाते। तब प्रेम कहानी तोता-मैना जैसी ही होती। अगर कोई कोयल की तरह कूक पाता तो उसे लता और रफ़ी की तरह अच्छा गायक समझा जाता। तब गीत न होते और अगर संगीत होता तो केवल प्रकृति का संगीत होता। मंद मंद बहती हवा का होता, कल कल करते नालों का होता और झर झर करते झरनों का होता। 
 बिना शब्दों की दुनिया में हम या तो मिस्टर बीन की तरह होते या चार्ली चैपलिन की तरह होते या फ़िर माइम के किसी एक्टर की तरह। हम किसी गूंगे की कल्पना भी कर सकते हैं। टीवी पर केवल ईशारों से ही समाचार दिखाये जाते और सिनेमा के रुपहले पर्दे की कहानी ‘राजा ‘हरीशचंद्र‘ से ‘आलामारा: तक न पहुंचती। तब केवल चार्ली चैपलिन या मिस्टर बीन जैसे ही अदाकार दिखते। शब्दहीन लोकतंत्र में विरोध के नारे न लगते, न कोई लिखित बैनर होते, न तख्तियों के सहारे कोई अपनी भड़ास निकाल पाता। तब शायद आदमी बंदरों के किसी दल की तरह शोर मचाते। ऐसे में कोई ब्यान न दे पाता और न ब्यान पर बवाल होता न सियासत। ऐसे में अभिव्यक्ति की आज़ादी कौन बात करता और क्या बात करता? तब न कोई अखबार होता, न कोई साहित्य होता।  
शब्दों के बगैर दुनिया वास्तव में हमारी दुनिया अधूरी और निरस होती। सचमुच शब्द हमारी दुनिया को कई तरह के रंगों से भरते हैं। ये हमारी ज़िंदगी को नया आयाम देते हैं। शब्दों से हम समझते भी है और समझाते भी हैं। शब्द अपने आप में शक्ति हैं और किसी को भी शक्ति प्रदान करते हैं। ये शब्द आपकी भी शक्ति बन सकते हैं। कोई समझ ले तो एक शब्द भी जीवन बदल देता है, न समझो तो लाखों शब्द भी निरर्थक हैं। शब्द घाव भी देते हैं और घावों पर मरहम भी लगाते हैं। 
 शब्द आज़ाद है, पर उनका चुनाव करने के लिए आपको विवेकपूर्ण होना पड़ेगा। शब्द आप सुनते या पढ़ते ही नहीं, बल्कि वे एहसास दिलाते हैं। शब्दों की शक्ति असीम होती है। शब्द युद्ध और शान्ति दोनों करवाते हैं। कागज़ पर उतारे गए और मुंह बोले गये शब्द दुनिया में उथल पुथल मचा सकते हैं। शब्द धरा पर नहीं, दिलों पर पड़ते हैं और फ़िर बीज बन जाते हैं जिससे महाभारत जैसे युद्ध के भयानक वृक्ष भी अंकुरित हो सकते हैं या फ़िर विश्वशांति के पौधे। शब्द विध्वंसक परमाणु बम भी बन सकते हैं या पीड़ा से मुक्ति और मन को शीतलता देने वाली औषधि भी ।
 बहुत नासमझ होते हैं वो जो कहते हैं - शब्दों में क्या रखा है? इतिहास गवाह है कि दुनिया को दिशा देने वाले वही लोग थे जो शब्दों की अहमियत को समझते थे। अच्छे शब्द बहुमूल्य होते हैं और उनके इस्तेमाल में कोई खर्च नहीं आता। शब्दों के चयन में की गयी चंद लम्हों की गलतियों के कारण सदियों पछताना पड़ता है। ज़ुबान में हड्डी नहीं, परन्तु इससे उगले हुए शब्दों के तीर दिल को भेद कर रख देते हैं। इसलिए शब्दों का सोच समझ कर इस्तेमाल कीजिए। कहा भी है - ख़ुदा को पसंद नहीं सख्तियां ज़ुबान की, इसलिए हड्डी नहीं ज़ुबान की।

ईनामी सम्मान, शिक्षा व शिक्षक .... जगदीश बाली

ईनामी सम्मान, शिक्षा व शिक्षक
हाल ही में प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री शिक्षक सम्मान योजना को मंजूरी दी है। इन योजना के तहत पांच वर्षों तक बोर्ड की परीक्षाओं में 100 फीसदी परिणाम देने वाले गुरुओं को एक वर्ष का सेवा विस्तार मिलेगा। इसके साथ ये भी कहा जा रहा है कि लगातार तीन वर्षों तक वेहद खराब परिणाम देने वाले गुरुओं की सैलाना मिलने वाली वित्तीय बढ़ौतरी को भी रोका जा सकता है। वैसे शिक्षक दिवस पर मिलने वाले सम्मान के अतिरिक्त भी सौ फ़ीसदी परीक्षा परिणाम देने वाले विद्यालयों को भी सम्मनित किया जाता है। जब सरकार शिक्षकों को उनकी सेवाओं के लिए अच्छी खासी तनख्वाह देती है, तो जाहिर है सरकार शिक्षकों से अच्छे शैक्षणिक कार्य व परिणाम की तबकको भी रखती है। अच्छे परिणाम के लिए अध्यापकों को नवाज़ा जाना और खराब परिणाम के लिए जवाबदेही तय करना भी नाज़ायज़ नही है क्योंकि घटते शिक्षा के स्तर के लिए सरकार की अपनी भी तो जनता के प्रति जवाबदेही होती है। सैद्धांतिक तौर पर लगता है यह नीति बेहतर परीक्षा परिणाम के लिए शिक्षकों को प्रोत्साहित ज़रूर करेगी, परन्तु ज़रा ज़मीनी हकीकत से भी रूबरू हो लेते हैं।
    माना जा सकता है कि संस्कृत, ड्रॉइंग, शारीरिक शिक्षा जैसे विषयों में तो लगातार पांच वर्ष तक सौ फीसदी परिणाम आ भी सकता है, परन्तु अंग्रेज़ी, गणित, विज्ञान संकाय में ऐसा करना एक अज़ीम कारनामा होगा। बात एक वर्ष की होती तो बात कुछ बन भी सकती थी, परन्तु मौजूदा ग्रेडिंग प्रणली के चलते जो स्तर बोर्ड की 10वी और 12वी कक्षा के छात्रों का है, उसे देख कर लगता है इन विषयों में लगातार पांच वर्षों तक सौ फीसदी परिणाम देना परियों की कहानी जैसा है। प्रदेश सरकार स्वयं भी लंबे समय से ग्रेडिंग प्रणाली को शिक्षा के गिरते स्तर के लिए एक अहम कारण मानती है और केंद्र से मांग भी करती आयी है कि पास और फ़ेल प्रणाली पुन: आरंभ की जाए। यदि प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर परिणामों का आंकलन किया जाए तो ही आगे चल कर बोर्ड की परीक्षाओं में कोई बेहतर परिणाम आ सकते हैं। यदि पांचवी और आठवी स्तर तक ऐसी शिक्षक सम्मान योजना को लाया जाए, तो इस योजना की प्रासंगिकता और बढ़ जायेगी। सोने पर सुहागे वाली बात तब होगी जब शिक्षक सम्मान योजना के साथ प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर भी बोर्ड की परीक्षाएं पुरानी पास-फ़ेल की तरज़ पर पुन: शुरु की जाए। यदि दसवी व बारहवी की बोर्ड परीक्षाओं में अच्छा परीणाम आने पर शिक्षकों को नवाज़ा जा सकता है और खराब परिणामों के लिए लताड़ा जा सकता है, तो पांचवी व आठवी में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता? वास्त्तव में प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर जब अच्छा परिणाम आयेगा तो आगे चल कर अच्छे परिणाम की संभावना बढ़ जायेगी। निचले स्तर पर रही आधारभूत कमियों को 10वी व 12वी कक्षाओं को पढ़ाने वाले अध्यापक आखिर कहां तक पूरी कर सकते हैं और उन्हें इन कमियों के लिए क्यों दोषी माना जाए?
    माना जा सकता है कि सौ फ़ीसदी परीक्षा परिणाम देने वाला अध्यापक बेहतर है, परन्तु ये देखना भी ज़रूरी है कि ये परिणाम वास्तव में वर्ष भर की मेहनत का नतीज़ा है या फ़िर कुछ और। इस बात से भी तो इंकार नहीं किया जा सकता कि सौ फ़ीसदी परिणाम वर्ष भर निठल्ले रहने वाले शिक्षक परीक्षा भवन में मात्र तीन घंटे तक सक्रीय रह कर भी तो दे सकते हैं। ऐसा भी हुआ है कि जिन विषयों के पद खाली पड़े रहे, उन विषयों में भी सौ फ़ीसदी परीक्षा परिणाम आया। मैं ये तो नहीं कह रहा हूं कि प्रदेश के सभी परीक्षा केंद्रों पर बेथाशा नकल होती है, पर ऐसे केंद्र भी कम नहीं जहां बिना रोक-टोक के यह अनैतिक प्रक्रिया चलती है। ऐसे केंद्रों पर उड़न दस्ते या तो पहुंचते नहीं, अगर पहुंचते हैं तो चाय की चुस्कियों के साथ बिस्किट व पकौड़ों का आनंद लेने के बाद वे ये कह कर निकल लेते हैं - कौन पचड़े में पड़े, हमें क्या पड़ी है! सौ फ़ीसदी परीक्षा परिणाम ले कर ईनाम पाने की हसरत या खराब परिणाम आने का डर, कई अध्यापक इस तरह के हथकंडे अपनाने से भी गुरेज़ नहीं करेंगे। हां, यदि बोर्ड परीक्षा केंद्रों पर सी सी टी वी कैमरे लगा देता है तो शायद बात कुछ बन सकती है।
    सौ फ़ीसदी परिणाम ऐसा आंकड़ा है जो सुनने औए सुनाने में बहुत अच्छा लगता है, परन्तु हमेशा ज़रूरी नहीं कि ऐसा परिणाम न देने वाला अध्यापक अपना कार्य बेहतर ढंग से नहीं कर रहा। बहुत से शिक्षक हैं जो सही मायनों में बेहतर शिक्षक होने का फ़र्ज़ बखूबी अदा कर रहे हैं। ये अलग बात है कि मौजूदा शिक्षा प्रणली और ब्यवस्था के चलते उनकी कर्मठता व कर्तब्य निष्ठा किसी अनजान कोने में सिमट कर रह गयी है। सता के गलियारों तक उनके कार्य की आवाज़ नहीं पहुँच रही है न ही सत्ता के गलियारों का रास्ता उन तक पहुँचता है। वह कहीं दूर किसी स्कूल के छोटे से कोने में गुमनामी में भी अपने कार्य का निर्वाह कर रहा है। इस गुमनामी में अपने कर्तब्य का पालन करते हुए उसे ये चाह भी नहीं है कि उसे किसी अध्यापक दिवस पर नवाज़ा जाए और उसे कोई सेवा विस्तार मिले। वह तो बस अपना कार्य कर रहा है। उसे डर है जिस दिन वह भी ईनाम की कतार में शामिल हो जाएगा तो शायद उसका उद्देश्य बेहतर शिक्षा देना नहीं बल्कि ईनाम रह जाएगा। दूसरी और ऐसे गुरुओं की भी कमी नहीं है जो सत्ता के गलियारों से जुड़े रहने का हुनर जानते हैं और अक्सर विभागों या सरकार द्वारा किसी अध्यापक दिवस पर नवाज़े भी जाते हैं। उनके ईनामों के पीछे हकीकत कम व अफ़साना ज़्यादा होता है।
    नि:संदेह मुख्यमंत्री शिक्षक सम्मान जैसी योजना सरकार की चिंता व गंभीरता को तो दर्शाती है। यदि इस योजना को प्राथमिक स्तर से उच्च स्तर तक पुख्ता ढंग से अम्ल में लाया जाए तो यह अधिक प्रासंगिक और कारगर साबित हो सकती है। वैसे विभाग को अंग्रेज़ी, गणित व विज्ञान संकाय में सौ फ़ीसदी परिणाम देने वाले शिक्षकों को नवाज़ने के साथ उनकी एक कार्यशाला भी आयोजित करनी चाहिए जिसमें ये हुनरमंद शिक्षक बाकि शिक्षकों को भी सौ फ़ीसदी परिणाम पाने का राज़ और गुर बताएं। आखिर बाकि शिक्षक भी तो जाने कि सौ फ़ीसदी परिणाम क्या बला है।

ईनामी सम्मान, शिक्षा व शिक्षक .... जगदीश बाली

ईनामी सम्मान, शिक्षा व शिक्षक
हाल ही में प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री शिक्षक सम्मान योजना को मंजूरी दी है। इन योजना के तहत पांच वर्षों तक बोर्ड की परीक्षाओं में 100 फीसदी परिणाम देने वाले गुरुओं को एक वर्ष का सेवा विस्तार मिलेगा। इसके साथ ये भी कहा जा रहा है कि लगातार तीन वर्षों तक वेहद खराब परिणाम देने वाले गुरुओं की सैलाना मिलने वाली वित्तीय बढ़ौतरी को भी रोका जा सकता है। वैसे शिक्षक दिवस पर मिलने वाले सम्मान के अतिरिक्त भी सौ फ़ीसदी परीक्षा परिणाम देने वाले विद्यालयों को भी सम्मनित किया जाता है। जब सरकार शिक्षकों को उनकी सेवाओं के लिए अच्छी खासी तनख्वाह देती है, तो जाहिर है सरकार शिक्षकों से अच्छे शैक्षणिक कार्य व परिणाम की तबकको भी रखती है। अच्छे परिणाम के लिए अध्यापकों को नवाज़ा जाना और खराब परिणाम के लिए जवाबदेही तय करना भी नाज़ायज़ नही है क्योंकि घटते शिक्षा के स्तर के लिए सरकार की अपनी भी तो जनता के प्रति जवाबदेही होती है। सैद्धांतिक तौर पर लगता है यह नीति बेहतर परीक्षा परिणाम के लिए शिक्षकों को प्रोत्साहित ज़रूर करेगी, परन्तु ज़रा ज़मीनी हकीकत से भी रूबरू हो लेते हैं।
    माना जा सकता है कि संस्कृत, ड्रॉइंग, शारीरिक शिक्षा जैसे विषयों में तो लगातार पांच वर्ष तक सौ फीसदी परिणाम आ भी सकता है, परन्तु अंग्रेज़ी, गणित, विज्ञान संकाय में ऐसा करना एक अज़ीम कारनामा होगा। बात एक वर्ष की होती तो बात कुछ बन भी सकती थी, परन्तु मौजूदा ग्रेडिंग प्रणली के चलते जो स्तर बोर्ड की 10वी और 12वी कक्षा के छात्रों का है, उसे देख कर लगता है इन विषयों में लगातार पांच वर्षों तक सौ फीसदी परिणाम देना परियों की कहानी जैसा है। प्रदेश सरकार स्वयं भी लंबे समय से ग्रेडिंग प्रणाली को शिक्षा के गिरते स्तर के लिए एक अहम कारण मानती है और केंद्र से मांग भी करती आयी है कि पास और फ़ेल प्रणाली पुन: आरंभ की जाए। यदि प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर परिणामों का आंकलन किया जाए तो ही आगे चल कर बोर्ड की परीक्षाओं में कोई बेहतर परिणाम आ सकते हैं। यदि पांचवी और आठवी स्तर तक ऐसी शिक्षक सम्मान योजना को लाया जाए, तो इस योजना की प्रासंगिकता और बढ़ जायेगी। सोने पर सुहागे वाली बात तब होगी जब शिक्षक सम्मान योजना के साथ प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर भी बोर्ड की परीक्षाएं पुरानी पास-फ़ेल की तरज़ पर पुन: शुरु की जाए। यदि दसवी व बारहवी की बोर्ड परीक्षाओं में अच्छा परीणाम आने पर शिक्षकों को नवाज़ा जा सकता है और खराब परिणामों के लिए लताड़ा जा सकता है, तो पांचवी व आठवी में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता? वास्त्तव में प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर जब अच्छा परिणाम आयेगा तो आगे चल कर अच्छे परिणाम की संभावना बढ़ जायेगी। निचले स्तर पर रही आधारभूत कमियों को 10वी व 12वी कक्षाओं को पढ़ाने वाले अध्यापक आखिर कहां तक पूरी कर सकते हैं और उन्हें इन कमियों के लिए क्यों दोषी माना जाए?
    माना जा सकता है कि सौ फ़ीसदी परीक्षा परिणाम देने वाला अध्यापक बेहतर है, परन्तु ये देखना भी ज़रूरी है कि ये परिणाम वास्तव में वर्ष भर की मेहनत का नतीज़ा है या फ़िर कुछ और। इस बात से भी तो इंकार नहीं किया जा सकता कि सौ फ़ीसदी परिणाम वर्ष भर निठल्ले रहने वाले शिक्षक परीक्षा भवन में मात्र तीन घंटे तक सक्रीय रह कर भी तो दे सकते हैं। ऐसा भी हुआ है कि जिन विषयों के पद खाली पड़े रहे, उन विषयों में भी सौ फ़ीसदी परीक्षा परिणाम आया। मैं ये तो नहीं कह रहा हूं कि प्रदेश के सभी परीक्षा केंद्रों पर बेथाशा नकल होती है, पर ऐसे केंद्र भी कम नहीं जहां बिना रोक-टोक के यह अनैतिक प्रक्रिया चलती है। ऐसे केंद्रों पर उड़न दस्ते या तो पहुंचते नहीं, अगर पहुंचते हैं तो चाय की चुस्कियों के साथ बिस्किट व पकौड़ों का आनंद लेने के बाद वे ये कह कर निकल लेते हैं - कौन पचड़े में पड़े, हमें क्या पड़ी है! सौ फ़ीसदी परीक्षा परिणाम ले कर ईनाम पाने की हसरत या खराब परिणाम आने का डर, कई अध्यापक इस तरह के हथकंडे अपनाने से भी गुरेज़ नहीं करेंगे। हां, यदि बोर्ड परीक्षा केंद्रों पर सी सी टी वी कैमरे लगा देता है तो शायद बात कुछ बन सकती है।
    सौ फ़ीसदी परिणाम ऐसा आंकड़ा है जो सुनने औए सुनाने में बहुत अच्छा लगता है, परन्तु हमेशा ज़रूरी नहीं कि ऐसा परिणाम न देने वाला अध्यापक अपना कार्य बेहतर ढंग से नहीं कर रहा। बहुत से शिक्षक हैं जो सही मायनों में बेहतर शिक्षक होने का फ़र्ज़ बखूबी अदा कर रहे हैं। ये अलग बात है कि मौजूदा शिक्षा प्रणली और ब्यवस्था के चलते उनकी कर्मठता व कर्तब्य निष्ठा किसी अनजान कोने में सिमट कर रह गयी है। सता के गलियारों तक उनके कार्य की आवाज़ नहीं पहुँच रही है न ही सत्ता के गलियारों का रास्ता उन तक पहुँचता है। वह कहीं दूर किसी स्कूल के छोटे से कोने में गुमनामी में भी अपने कार्य का निर्वाह कर रहा है। इस गुमनामी में अपने कर्तब्य का पालन करते हुए उसे ये चाह भी नहीं है कि उसे किसी अध्यापक दिवस पर नवाज़ा जाए और उसे कोई सेवा विस्तार मिले। वह तो बस अपना कार्य कर रहा है। उसे डर है जिस दिन वह भी ईनाम की कतार में शामिल हो जाएगा तो शायद उसका उद्देश्य बेहतर शिक्षा देना नहीं बल्कि ईनाम रह जाएगा। दूसरी और ऐसे गुरुओं की भी कमी नहीं है जो सत्ता के गलियारों से जुड़े रहने का हुनर जानते हैं और अक्सर विभागों या सरकार द्वारा किसी अध्यापक दिवस पर नवाज़े भी जाते हैं। उनके ईनामों के पीछे हकीकत कम व अफ़साना ज़्यादा होता है।
    नि:संदेह मुख्यमंत्री शिक्षक सम्मान जैसी योजना सरकार की चिंता व गंभीरता को तो दर्शाती है। यदि इस योजना को प्राथमिक स्तर से उच्च स्तर तक पुख्ता ढंग से अम्ल में लाया जाए तो यह अधिक प्रासंगिक और कारगर साबित हो सकती है। वैसे विभाग को अंग्रेज़ी, गणित व विज्ञान संकाय में सौ फ़ीसदी परिणाम देने वाले शिक्षकों को नवाज़ने के साथ उनकी एक कार्यशाला भी आयोजित करनी चाहिए जिसमें ये हुनरमंद शिक्षक बाकि शिक्षकों को भी सौ फ़ीसदी परिणाम पाने का राज़ और गुर बताएं। आखिर बाकि शिक्षक भी तो जाने कि सौ फ़ीसदी परिणाम क्या बला है।

लेखक, कुमारसैन, शिमला

http://epaper.divyahimachal.com/c/14948676

( जगदीश बाली लेखक, कुमारसैन, शिमला से हैं )
कई झमेलों के चलते तालीम के बिगड़े हुए हुलिए को सुधारने के लिए निरीक्षण सैल भले ही रामबाण औषधि नहीं है, परंतु यह एक ठोस व बड़ा कदम है। विडंबना यह है कि हमारे देश में कदम तो ठोस होते हैं, पर कई बार इतने ठोस होते हैं कि या तो उठने में लंबा समय लग जाता है या फिर उठते-उठते रह जाते हैं…
प्रदेश के विद्यालयों को नियमित निरीक्षण की किस कद्र दरकार है, इस बात का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि यदा-कदा आला अधिकारियों द्वारा सरकारी विद्यालयों का औचक निरीक्षण किया गया, तो उस दौरान अकसर कई अध्यापक अपनी ड्यूटी से नदारद पाए जाते रहे हैं। ऐसा ही एक मामला कुछ समय पहले सामने आया, जब शिमला के जिलाधीश महोदय ने एक सरकारी विद्यालय का औचक निरीक्षण किया और विद्यालय के मुखिया सहित छह अध्यापकों को नदारद पाया। एक साथ किसी एक विद्यालय से इतने सारे गुरुजनों का गायब रहना, वह भी मुखिया सहित, शिक्षकों के काम करने के तौर-तरीकों और कर्त्तव्यनिष्ठा पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। हालांकि ऐसे औचक निरीक्षण यदा-कदा ही होते हैं, परंतु यदि इस तरह के निरीक्षण नियमित रूप से होते रहें, तो ऐसे मामलों की संख्या ज्यादा नहीं तो सैकड़ों में तो हो ही सकती है।    आदत कहो या बीमारी, इस प्रवृत्ति पर नकेल कसने के लिए सरकार भी कमर कस रही है। जहां प्रदेश के कई स्कूलों में बायोमीट्रिक मशीन लगने के शुरुआती दौर की कसमसाहट व नानुकर से उबर कर शिक्षक समयबद्ध होते नजर आ रहे हैं, वहीं प्रदेश सरकार शिक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद रखने के लिए निरीक्षण सैल के गठन को काफी पहले मंजूरी दे चुकी है। आजकल शिक्षा विभाग 94 लोगों वाले इस सैल के गठन की कवायद में जुटा है। शायद सरकार समझ चुकी है कि आरएमएसए और एसएसए के चिंताजनक नतीजों के पीछे सशक्त निगरानी व्यवस्था का न होना एक बहुत बड़ा कारण रहा है। इन परियोजनाओं को कार्यान्वित करवाने के लिए कागजी आदेशों का ज्यादा सहारा लिया गया और जमीनी हकीकत की ओर तवज्जो कम ही दी गई। दावे कुछ और थे, नतीजे उससे उलट कुछ और, क्योंकि कागजी घोड़ों को दौड़ाना अलग बात है और असली घोड़ों को दौड़ाना कुछ और बात। इस बार लगता है, साहब लोग संजीदा हैं।
निरीक्षण सैल इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि आज आला अफसरों को स्कूलों के निरीक्षण की फुर्सत बमुश्किल मिलती है, क्योंकि विभाग भी तो इतना विस्तृत है। कभी-कभार निरीक्षण के लिए अगर वक्त निकाल भी लेते हैं, तो सिर्फ तभी अगर कोई शिकायत आलाकमान तक पहुंचती है। पूरे सत्र भर ये जानने की जहमत नहीं उठाई जाती कि अमुक विद्यालय में पठन-पाठन का कार्य सही मायनों में चल रहा है या नहीं। वर्ष भर कुंभकर्णी नींद में सोये रहना, परिणाम आने पर चौकन्ने हो जाना और शत-प्रतिशत परिणाम की तमन्ना तर्कसंगत नहीं जान पड़ती। शॉर्टकट हल से सौ फीसदी नतीजा पाने की हसरत में कई दूसरी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं, जो अक्लमंदी नहीं, क्योंकि किसी घर की रोशनी की खातिर किसी के घर नहीं जलाए जाते। शैक्षणिक माहौल को दुरुस्त करना हालांकि आसान सफर नहीं जान पड़ता, फिर भी निरीक्षण सैल की स्थापना सरकार की नेक मंशा की ओर इशारा जरूर कर रही है। यह सैल अपने मंतव्य व गंतव्य को साध पाएगा या नहीं, यह अभी कहा नहीं जा सकता, क्योंकि अकसर हम नए फैसलों और नीतियों का जोशोखरोश के साथ बखान और आगाज तो कर लेते हैं, परंतु जमीनी हकीकत में नतीजा रहता है वही ढाक के तीन पात।
निरीक्षण सैल की स्थापना व हर विद्यालय में बायोमीट्रिक मशीनों से हाजिरी, ये दोनों कदम इस बात के द्योतक हैं कि सरकार और शिक्षा के आलमबरदार मन में यह बिठा चुके हैं कि गुरुजी अपने कर्त्तव्य के प्रति कोताही बरत रहे हैं। पर क्या सभी ऐसे हैं? हरगिज नहीं। अहम होगा कि अन्य कमियों के अलावा क्या निरीक्षण सैल नकर्मे गुरुओं की निशानदेही कर उन्हें राह पर ला पाएगा। अगर यह ऐसा नहीं कर पाता तो इसकी भी जवाबदेही तय हो, क्योंकि 94 लोगों की तैनाती का कुछ तो औचित्य हो। और हां, निरीक्षक महोदय, रपट जरा ध्यान से बनाइएगा, क्योंकि कहीं गुरुओं की निगहबानी के चक्कर में सैल जांच रपट की फाइलों में उलझ कर न रह जाए। निरीक्षण सैल गुरुओं को कसने में कामयाब हो भी गया, तो भी इसके अलावा हमारी शिक्षा व्यवस्था में कई और मुश्किलें भी हैं। ‘पप्पू पास हो गया’ वाली नीति, जो शिक्षा और शिक्षक के लिए सिरदर्द बनी हुई है, से कब मुक्ति मिलेगी? अध्यापक को कागजों में मगज खपाई से कब छुट्टी मिलेगी? जनगणना, पशुगणना, चुनाव, कब इन सब से छूट कर गुरुजी सिर्फ पप्पुओं की सुध ले पाएगा? ज्यादा देर ठीक है, देर कहीं ज्यादा ही न हो जाए :
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।

इतने सारे झमेले के चलते तालीम के बिगड़े हुए हुलिए को सुधारने के लिए निरीक्षण सैल भले ही रामबाण औषधि नहीं है, परंतु यह एक ठोस व बड़ा कदम है। इसके पीछे सोच और मंशा सकारात्मक है।  विडंबना यह है कि हमारे देश में कदम तो ठोस होते हैं, पर कई बार इतने ठोस होते हैं कि या तो उठने में लंबा समय लग जाता है या फिर उठते-उठते रह जाते हैं। आशा है हर स्कूल में बायोमीट्रिक मशीन लगने के साथ-साथ निरीक्षण सैल जल्द ही काम करना आरंभ कर देगा। पहला-पहला जाम है, साहब! जरा संभल कर।

एक नहीं कई ज़बाने सींचती है मेरे वतन को --- जगदीश बाली

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल' - जब जब भी हिंदी भाषा का ज़िक्र होता है, तो इस भाषा के चिंतक भारतेन्दु हरिशचन्द्र की प्रसिद्ध कविता मातृभाषा के प्रति' से ली गयी इस पंक्ति का जिक्र अवश्य करते हैं। ऐसा करना उचित भी है और स्वभाविक भी क्योंकि ये वो भाषा है जिस में हमने सबसे पहले अपने ज़ज़बातों व एहसासों को शब्दों में अभिव्यक्त करना आरंभ किया। चाहे हमारे संविधान में बहुत सी भाषाओं को राष्ट्रीय मान्यता दी गयी है, परन्तु हिंदी को राजभाषा का दर्ज़ा दिया गया है। टूटी-फ़ूटी ही सही, हिंदी देश के लगभग हर प्रांत और खंड में बोली या समझी जाती है। इस तरह यह देश को एक सूत्र में भी बांधती है।
परन्तु, हिंदी भाषा को तरज़ीह देने के मायने ये भी नहीं है कि अन्य भाषाओं को हिकारत भरी निगाहों से देखा जाए। भारतेन्दु जी स्वयं बहुत सी भाषाओं का इल्म रखते थे। मुझे भाषा के उन पंडितों से सख्त गिला है, जो हिंदी को हिंदुओं से, उर्दू को मुसलमानों से, अंग्रेज़ी को गोरों से, पंजाबी को पगड़ी से जोड़ने की कोशिश करते हैं। कई हिंदी के हिमायती तो कह-कह कर नहीं थकते कि अंग्रेज़ी भाषा से गुलामी की बू आती है, लेकिन ख़ुद 'मे आई कम इन', 'बाय-बाय', और 'थैंक यू' जैसे अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग करने में अपनी बड़ाई मानते हैं। वास्तव में भाषाएं तो एक दूसरे की बहनें होती हैं। वे कभी नहीं टकराती। टकराती तो भाषा के प्रति हमरी मानसिकता है। अगर हिंदी हमारी मां है, तो अन्य भाषाएं हमारी मौसियां हैं। अगर मां के पास हमें अभिव्यक्ति का रास्ता नहीं मिलता, तो मौसियों की शरण में हमें वह रास्ता मिलता है।
अगर हम अपनी-अपनी भाषाओं के दायरे खींच ले, तो न तो भाषाओं का आदान-प्रदान होगा, न उनका विकास होगा और न ही हम एक दूसरे की संस्कृति से पूरी तरह वाकिफ़ हो पाएंगे। यदि सभी अपनी अपनी भाषा का राग अलापने लगेंगे, तो भाषाओं का परस्पर मेल नहीं हो पाएगा। सोचिए अगर भाषाएं एक दूसरे से न मिलती, तो श्रीमद भगवद गीता को केवल हिंदु पढ़ पाते, कुरान मुसलमान ही पढ़ते, आदिग्रन्थ केवल सिक्ख जानता और बाइबल केवल ईसाईयों तक सीमित रहती, परन्तु इन पुस्तकों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध होने से विश्व के लोग इन्हें पढ़ पाते हैं।
हमारे देश की आज़ादी में भी कई भाषाओं का योगदान रहा है। राष्ट्रगीत ’वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ’जन गण मन’ हमें बांग्ला ने दिए और ’सारे जहां से अच्छा...’ इकबाल की उर्दू भाषा में लिखी गई देश प्रेम की ग़ज़ल है। अगर ’दिल्ली चलो’, 'करो या मरो' 'जय हिंद' जैसे नारे हिंदी के हैं, तो क्रांति का प्रतीक ’इंक़िलाब ज़िन्दाबाद’ का नारा उर्दू ज़बान का है। टैगोर की ’गीतांजली’ को ब्यापक सम्मान अंग्रेज़ी में अनुवादित होने के उपरांत मिला। चाहे राम प्रसाद बिस्मल ने कहा - ’लगा रहे प्रेम हिन्दी में, पढूँ हिन्दी लिखुँ हिन्दी’, फ़िर भी उनका उर्दू से बहुत लगाव था। उन्होंने बिस्मल को अपना तख़ल्लुस बनाया और कई वतन परस्ती से लवरेज़ तराने लिखे। उन्होंने क्रान्तिकारी बिस्मिल अज़ीमाबादी द्वारा लिखित उर्दू तराना ’सरफ़रोशी की तमन्न्ना आज हमारे दिल में है...’ को एक नारा बनाया जिसे हम आज भी गुनगुनाते हैं। मुंशी प्रेमचंद की कहानियों और दुष्यंत कुमार की गज़लों में हिंदी व उर्दू जिस तरह से हमामेज़ हुई हैं, वह साहित्य को एक ख़ूबसूरत आयाम देता है। जहां हिंदी, उर्दू और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं ने देश की आज़ादी में अहम भूमिका निभाई, वहीं आधुनिक भारत के जनक राजाराम मोहन राय ने अंग्रेज़ी का इस्तमाल भारत पुनर्जागरण के लिए किया। उन्होंने इस भाषा को अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच सेतु स्थापित करने के लिए भी किया। ये भी नहीं भूलना चाहिए कि पंडित नेहरू. आर के नारायनन, राजा राव, किरन देसाई, अरुनधति रॉय, जैसे भारतीय लेखकों ने अंग्रेज़ी भाषा का इस्तमाल करके ऐसी साहित्यिक रचनाएं लिखी जिनसे विश्व में देश का नाम रोशन हुआ है।
हिंदी भाषा के कई ख़ैरख्वाह अक्सर हो-हल्ला मचाते हैं कि हिंदी खतरे में है, जबकि वास्तव में यह केवल बेवजह का डर है। आज हिंदी चीनी भाषा मैंडरिन के बाद विश्व में इस्तमाल की जाने वाली सबसे बड़ी ज़बान है। वास्तव में हिंदी भाषा में अपने को बनाए रखने की सिफ़्त मौज़ूद है। आज यह गुगल से होते हुई कई देशों में बोली, लिखी व पढ़ी जाते है। हिंदी राष्ट्रभाषा, राजभाषा, सम्पर्क भाषा, जनभाषा के स्तर को पार कर विश्वभाषा बनने की ओर अग्रसर है। भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में हिन्दी का विश्वस्तर पर महत्वपूर्ण भाषाओं में शुमार होगा।
किसी भी भाषा के विस्तार और विकास के लिए ज़रूरी है कि यह दूसरी भाषाओं के प्रति उदार रहे। माना जा सकता है कि अंग्रेज़ी इस नज़रिए से अव्वल आती है क्योंकि इस में दूसरी भाषा के अल्फ़ाज़ को अपने में समाहित करने की बहुत क्षमता है। जैसे हिंदी के कई अल्फ़ाज़ ऐसे हैं जिन के मुकाबिल दूसरी ज़बान में अल्फ़ाज नहीं मिलते, ठीक वैसे ही दूसरी ज़बान के कई अल्फ़ाज़ ऐसे हैं जिन के मुकाबिल हिंदी में अल्फ़ाज नहीं। एक-दूसरे की ज़बान के अल्फ़ाज़ को हमामेज़ करने ही सलाहियत ही ज़बान को तरक्कीयाफ़दा बनती है।
भाषा वही जो दिलों में उतर जाए। हिंदी को मज़बूत और विकसित होने के लिए इसे आम लोगों के और निकट लाना होगा। नेल्सन मंडेला ने कहा है: "अगर आप एक आदमी से उस भाषा में बात करते हैं जिसे वह समझता है, तो वह उसके दिमाग तक जाती है। वहीं अगर आप उसकी अपनी भाषा में बात करते हैं, तो वह उसके दिल में उतरती है।" भले ही कुछ साहित्य के पारखियों का मानना है कि कलिष्ट शब्दों के इस्तमाल से भाषा मज़बूत होती है और इसकी शान बढ़ती है, परन्तु ऐसा असलियत में नहीं होता। कठिन व कलिष्ट भाषा का इस्तमाल आपकी भाषा विद्वता की दृष्टि से तो उचित हो भी सकता है, परन्तु इस तरह यह जनमानस की भाषा नहीं बन सकती। जो भाषा जनमानस की नहीं बन सकती, वह कभी विकसित नहीं हो सकती।
विचारक योहान वुल्फगांग फान गेटे, जिन्होंने कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् का जर्मन भाषा में अनुवाद किया, ने कहा है: "जिसे किसी विदेशी भाषा का कोई ज्ञान नहीं, उसे अपनी भाषा का भी कोई ज्ञान नहीं होता।" विभिन्न भाषाओं वाले इस देश में तो बहुभाषिये होना एक काबिलेतारीफ़ सलाहियत है। भाषा किसी की बांदी नहीं होती। इसे किसी खूंटे से नहीं बांधा जाना चाहिए अन्यथा यह ऐसे पिंजरे के पंछी की तरह हो जाती है जिसे ज़ीने के लिए दाना तो मिलता है, पर उसकी ऊड़ान कुंद रह जाती है। हिंदी भाषा की सादगी, उर्दू की लज़्ज़त, पंजाबी की मस्ती और अंग्रेज़ी की ख़नक मिल जाए तो भाषा का ज़ायका वैसा होगा जैसा अपने ख़ेत की राजमाह की दाल का जिसमें टमाटर का तड़का लगा हो।

बहुत खतरनाक होता है बेजान खामोशी से भर जाना --- जगदीश बाली

इतिहास गवाह है कि अमानवीय तौर तरीके हमेशा संसार को विनाश के गर्त की ओर ही धकेलते हैं और मानवीय मूल्यों ने ही हमेशा संसार को रोशनी दी है। वो इंसानियत का ही तकाज़ा था जिस के चलते 23 वर्षीय विमान परिचारिका नीरजा भनोत ने वीरतापूर्ण आत्मोत्सर्ग करते हुए 1996 में अपहरित विमान पैन एम 73 में सवार कई यात्रियों और बच्चों की ज़ान बचाई। अगर इंसानियत न होती, तो जुलाई 2016 में भोपल के कृष्णा नगर का 23 वर्षीय दीपक अपनी जान गंवा कर 20 लोगों को डूबने से न बचाता। अगर इंसानियत न होती, तो कैलाश सतयार्थी व मलाला युसुफजई नौनिहालों के बचपन को बचाने के लिए आंदोलन न करते। अगर मानवीय मूल्य ज़िंदा न होते तो महात्मा गांधी, मदर टेरेसा, नैल्सन मंडेला जैसे लोग भी मज़लूम लोगों के शॊषण के विरुद्ध आवाज़ बुलंद न करते। अगर स्वार्थपूर्ण और विलासिता भरा जीवन ही सबकुछ है, तो अमेरिका के राष्ट्र्पति होते हुए अब्राहम लिंकन ईमानदारी को अपनी जीवनशैली क्यों बनाए रखते? 
मुझे क्या लेना? - ये वो जुमला है जिसके चारों ओर आकर हमारी आधुनिक जीवनशैली किसी हद तक केंद्रित हो गयी हैं। कोई पड़ोसी के घर को कोई लूट रहा है और हम कहते हैं - अपनी नींद क्यों खराब करूं, मुझे क्या लेना? कोई अकेला पड़ा बिमार मर रहा है, तो मरे, उसकी तिमारदारी क्यों करें? आपको क्या लेना? हम भूल रहें हैं कि जिस दरख़्त के साये में आज हम धूप की गर्मी से निजात पा रहे हो, कई सालों पहले उसे उगाने वाले ने ये नहीं कहा था: " "मुझे क्या लेना।" 
इंसान तब तक इंसान है, जब तक उसमें इंसानियत ज़िंदा है और जब तक इंसानियत ज़िंदा है, तब तक इंसान ज़िंदा है। जब इंसान के अंदर का इंसान मरने लगता है, तब मानव संवेदनाएं दम तोड़ने लगती है। तब सहानुभूति, दया, परोपकार, उत्सर्ग, ईमानदारी जैसे गुण कहीं खोने लग जाते हैं। इंसान को ज़िंदा रहने के लिए दो वक्त की रोटी चाहिए और मरने के लिए दो गज़ ज़मीन, परन्तु आज वह दूसरे की थाली की दो रोटियां भी छीन लेना चाहता है और फ़िर भी अगर पेट नहीं भरता, तो करोड़ों का चारा भी खा लेता है। कोई अपनी प्यास की खातिर पूरे दरिया को कब्ज़ा कर बैठा है और दूसरों के हिस्से के कतरों पर भी नज़रें गढ़ाए बैठा है। मानव मर्यादाएं जब मर जाती हैं, तो एक नहीं, कई निर्भयाओं की अस्मत को तार-तार कर दिया जाता है। जब सिक्कों की खनक ही सब कुछ हो जाए, तो उस खनक की खातिर अस्पतालों में नवजात शिशुओं को भी बदल दिया जाता है। जब दया का पानी सूख जाता है, तो दरिंदा बन कर इंसान न जाने युग जैसे कितने मासूमों को बेरहमी से मौत की नींद सुला देता है। जब इंसान दौलत के मद में अंधा हो जाता है और मजलूम व बेसहारा लोगों पर गाड़ी चढ़ा लेने के बाद भी वह पाकदामन हो आज़ाद निकल जाता हैं, तब इंसाफ़ का कहीं न कहीं कत्ल ज़रूर होता है।
कोई बेचारा दुर्घटना के कारण सड़क पर तड़प रहा होता है और कोई उसका वीडिओ बना कर फ़ेसबुक पर अपलोड करने में मसरूफ़ होता है। कहीं पुलिस या अदालत आड़े-तिरछे सवाल न पूछ ले, इस डर से उसे अस्पताल पहुंचाने की ज़हमत कोई-कोई ही करता है। वो कहता है - कौन पचड़े में पड़े? अगर जगह कम भीड़-भाड़ वाली हो, तो कोई गिद्ध दृष्टि गड़ा कर उसका माल हड़प्प कर रफ़्फ़ू चक्क्कर होने की ताक में रहता है। अस्पताल में कोई रोगी तरस रहा होता है कि ख़ुदा के नाम पर उसे ख़ून के चंद कतरे मयस्सर हो जाए, उधर ख़ुदा के नाम पर सड़कों पर लोग ख़ून बहाने पर आमादा होते हैं। 
विषादित करने वाला पहलू यह है कि हमारे समाज में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं जो ज्ञान और जानकारियों से सराबोर हैं, परन्तु ऐसे लोगों की बहुत कमी हैं जिनमें इंसान मौज़ूद है। ज्ञान के सारे पाठ तो इंसान ने पढ़ लिये, लेकिन इंसानियत का सबक किसी किताब के पन्ने में दफ़न हो कर रह गया। आज शिक्षण संस्थानों में इंसानियत के सबक सिखाने और सीखने की सख्त दरकार है। पढ़ना-लिखना आ जाए, अंगूठे की छाप की जगह हस्ताक्षर करना आ जाए, डिग्री प्राप्त हो जाए, फ़िर नौकरी हासिल करना और पैसा कमाने की मशीन बनना, क्या यही शिक्षा है? शिक्षा का मतलब केवल जानकारी इकट्ठा करना ही नहीं है, बल्कि एक बेहतर इंसान बनाना इसका मूल उद्देश्य है। मूल्यहीन शिक्षा अनर्थकारी हो सकती है। मानव मूल्यों को छोड़ कर केवल मस्तिष्क से शिक्षित होने का मतलब है समाज के लिए पढ़े-लिखे शैतान तैयार करना। ज्ञानी तो रावण भी कम नहीं था। 
इंसानियत के बगैर इंसान उस खुदा की तरह है, जो खुदा तो है पर उसमें फ़रिश्तों जैसा दिल नहीं। फ़रिश्तों का दिल नहीं, तो ख़ुदा कैसा और अगर इंसानियत नहीं, तो इंसान कैसा? मनुष्य चाहे कितना ही सुंदर हो, परन्तु यदि वह मानवीय मूल्यों से शून्य है, तो उसमें और पशु में कोई ज़्यादा फ़र्क नहीं। 
माना कल जिसका कत्ल हुआ, वो आपका बेटा, भाई कुछ नहीं था। माना कल जिसकी अस्मत लुटी थी, वो आपकी बहू या बेटी नहीं थी। अगर आपको आज उनसे कुछ नहीं लेना, तो कल जब आपके बेटे, आपके भाई, आपकी बहू, आपकी बेटी के साथ ऐसा घट गया, तो फ़िर किसी को क्यों आपसे कुछ लेना? ये मंज़र देख कर, सुन कर अगर आप का भी दिल नहीं दहलता, आप का दिल नहीं पसीजता, आप कोई सिहरन महसूस नहीं करते, तो कहीं आप के अंदर का इंसान भी मर तो नहीं रहा? कहीं आपके अंदर की संवेदनाएं भी खत्म तो नहीं हो रही? कहीं आप भी ये तसल्ली दे कर तो खामोश नहीं बैठ गए हैं - मुझे क्या लेना? बहुत खतरनाक होता है बेज़ान खामोशी से भर ज़ाना। अगर आप को कुछ नहीं लेना, तो बस डॉ नवाज़ देवबंदी साहब की ये लाइनें आप से कहना चाहुंगा, बाकि मुझे क्या लेना?
उसके कत्ल पे मैं भी चुप था, मेरा नंबर अब आया
मेरे कत्ल पर आप भी चुप हैं, अगला नंबर आपका है