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शिक्षा की जरूरत-- बचन सिंह घटवाल

हिमाचल के सरकारी स्कूलों के संदर्भ में लोगों के चेहरे पर खिंची चिंता की लकीरें साफ-साफ दिखाई दे रही हैं, क्योंकि दशक पूर्व के वैभव के विपरीत वर्तमान में शिक्षा के स्तर व बच्चों की संख्या में खासा अंतर प्रतिलक्षित हो रहा है। सरकारी स्कूलों के प्रति आज लोगों के विचारों का अवलोकन करें तो मन व्यथित हो उठता है। अध्यापकों की योग्यता के बारे में प्रचलित धारणा, आज बेमानी सी लगती है, क्योंकि उनकी योग्यता का स्तर आज कहीं ज्यादा सुदृढ़ व पारदर्शी हो गया है। आज शिक्षक गुणवत्ता की कसौटी, जिसमें शैक्षणिक योग्यता में निर्धारित प्रतिशतता, शिक्षक पात्रता परीक्षा व कमीशन उत्तीर्ण कर मैरिट में आने के उपरांत साक्षात्कार पर खरा उतरने के बाद नियुक्ति पाता है। जब शिक्षक बिलकुल पैमाने पर खरा उतरने के बाद अपने पेशे में उतरता है, तो अध्यापक की गुणवत्ता पर संदेह करना निरर्थक व बेमानी लगता है। आज सरकार ने 20 बच्चों पर एक अध्यापक की नीति अपना कर प्राथमिक स्कूलों का बंटाधार कर दिया है। जिस स्कूल में पहली कक्षा से पांचवीं कक्षा तक 20 बच्चे होंगे, वहां सरकारी नियमानुसार एक अध्यापक नियुक्त होगा। अब भला अलग-अलग कक्षा के छात्रों के लिए एक अध्यापक किस तरह सामंजस्य बिठाता होगा, यह विचार का विषय है। उसी एक अध्यापक को ऐसे में मिड-डे मील खिलाने से लेकर उसके लेखे-जोखे के हिसाब-किताब का भी पूरा ध्यान रखना पड़ता है, तो बताइए ऐसे में गुणात्मक शिक्षा की उम्मीद क्या बेमानी नहीं है। इसके अतिरिक्त शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्य जैसे कि चुनावी ड्यूटी, जनगणना और आईआरडीपी सर्वेक्षण करवाने से शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। इसमें संदेह नहीं कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो प्रदेश में सरकारी प्राथमिक स्कूल बच्चों की कमी के चलते बंद होने की कगार पर पहुंच जाएंगे। आज मुफ्त वर्दी, मुफ्त किताबें तथा मिड-डे मील का आकर्षण बच्चों को आकर्षित करने में नाकाफी है। अगर सरकार सरकारी स्कूलों के प्रति वास्तव में गंभीर है तो वर्तमान नीतियों में परिवर्तन करके स्कूलों में कम से कम एक कक्षा एक अध्यापक की नीति को अपनाना जरूरी है। इस बात का भी ध्यान रखना जरूरी है कि जिन स्कूलों में बच्चों की संख्या कम है, उसे नजदीकी पाठशाला में समन्वित कर देना चाहिए, ताकि उस पाठशाला में बच्चों की संख्या बढ़ाई जा सके। सरकार को निजी स्कूल खोलने की अनुमति देने से पहले उस क्षेत्र की प्राथमिक पाठशाला में बच्चों की संख्या व स्कूलों की संख्या का भी ध्यान रखना जरूरी है। सरकारी प्राइमरी स्कूलों में बच्चों की घटती संख्या के लिए एक और कारण खासा जिम्मेदार प्रतीत होता है। वह यह कि सरकारी प्राथमिक स्कूलों में बच्चों के दाखिले की आयु सीमा पांच वर्ष निर्धारित की गई है, परंतु दूसरी तरफ निजी स्कूलों में तीन वर्ष की आयु सीमा में बच्चे को एलकेजी व नर्सरी में दाखिल कर लिया जाता है। अतः आयु सीमा का यह अंतर खत्म कर सभी के लिए अनिवार्य पांच वर्ष की सीमा निर्धारित करनी चाहिए। इस परिवर्तन से भी सरकारी स्कूलों के वैभव को लौटाया जा सकता है। आज के महंगाई के युग में अभिभावक वैसे ही निजी स्कूलों में बढ़ती फीस से त्रस्त हैं। आज मूल्यांकन प्रणाली लागू होने से भी शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ा है। वर्ष 2009 में पहली से आठवीं कक्षा तक समग्र एवं सतत मूल्यांकन पद्धति लागू की गई थी। ग्रेडिंग प्रणाली के तहत बच्चों को आगे से आगे धकेलने की नीति बच्चों के साथ खिलवाड़ की तरह है। अभी बजट सत्र के दौरान प्रदेश के मुख्यमंत्री ने पहल करते हुए एक संकल्प प्रस्ताव रखा, जिसे विपक्ष ने भी स्वीकार कर लिया है। इसमें आरटीआई की धारा 30 में संशोधन के लिए प्रस्ताव को केंद्र सरकार की स्वीकृति के लिए भेज दिया गया है। इसमें बच्चों के शिक्षा के अधिकार के एक्ट 2009 की धारा के साथ एक उपधारा-तीन जोड़ने के लिए कहा गया है, जिससे राज्य सरकारों को समग्र एवं सतत मूल्यांकन प्रणाली के पूरी तरह लागू होने तक पांचवी व आठवीं में बोर्ड परीक्षा करने की अनुमति प्रदान करने के लिए कहा गया है। बोर्ड परीक्षा की वजह से बच्चे व शिक्षक गंभीर अवश्य होंगे, जिसकी वजह से बच्चों की पढ़ाई में अनुकूल असर पड़ेगा। इस परिवर्तन के अतिरिक्त अन्य और परिवर्तन शिक्षा के स्तर को सुधारने में अहम भूमिका निभा सकते हैं, जिनका सभी को बेसब्री से इंतजार है

24 बोर्ड को मान्‍यता नहीं

हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड ने प्रदेश में देश भर के 24 बोर्डों की मान्यता रद्द कर दी है। शिक्षा बोर्ड ने इन सभी बोर्डों की लिस्ट जारी कर दी है। देश भर के इन बोर्डों में देश की राजधानी के ही नौ बोर्ड शामिल हैं। प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड ने साफ कहा है कि प्रदेश में प्राइवेट स्तर पर चलने वाले बोर्ड, बॉडीज, यूनिवर्सिटी आदि से प्राप्त किए गए प्रमाणपत्र मान्य नहीं होंगे और इनका इस्तेमाल हिमाचल में उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए नहीं किया जा सकता। उल्लेखनीय है कि बोर्ड के पास कई बार ऐसे बोर्डों के मामले सामने आते हैं जो बोर्ड से मान्यता प्राप्त नहीं होते तथा इससे विद्यार्थियों का समय और पैसा दोनों बर्बाद होता है। बोर्ड को विभिन्न क्षेत्रों से परीक्षार्थियों द्वारा समय-समय पर परीक्षाओं की समकक्ष मान्यता के संबंध में किए गए पत्राचार के चलते बोर्ड ने ऐसे देश भर के 24 बोर्डों की सूची तैयार की है, जिनकी परीक्षाओं और प्रमाण पत्रों को हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड मान्यता प्रदान नहीं करता है। उल्लेखनीय है कि स्कूल शिक्षा बोर्ड सरकार द्वारा स्थापित बोर्डों, संस्थाओं और विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं को उच्च शिक्षा में प्रवेश हेतु समकक्ष मान्यता देता है। इससे पहले जारी सूची में 22 यूनिवर्सिटियों के नाम शामिल थे। बोर्ड ने इन बोर्डों यूनिवर्सिटियों की सूची प्रदेश के प्राइवेट और सरकारी स्कूलों सहित अन्य शिक्षण संस्थानों को भी भेजी है। बोर्ड सचिव राखिल काहलों ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि बोर्ड ने ऐसे 24 बोर्डों की सूची जारी की है, जिनको बोर्ड से मान्यता नहीं है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी किसी भी बोर्ड में दाखिला लेने से पहले उसकी मान्यता के बारे में जानकारी जरूर प्राप्त करें। आफ हायर एजुकेशन दिल्ली, दिल्ली बोर्ड आफ सीनियर सेकेंडरी एजुकेशन, इंडियन काउंसिल ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन, आल इंडिया बोर्ड आफ एजुकेशन ट्रेनिंग दिल्ली, आल इंडिया बोर्ड आफ सेकेंडरी एजुकेशन दिल्ली, बोर्ड आफ अडल्ट एजुकेशन एंट ट्रेनिंग दिल्ली, सेंट्रल बोर्ड आफ हायर एजुकेशन नई दिल्ली, सेंट्रल बोर्ड आफ हायर एजुकेशन नई दिल्ली, दि सेंट्रल बोर्ड आफ हायर एजुकेशन नई दिल्ली, जामिया उर्दू अलीगढ़, गुरुकुल विश्वविद्यालय वृंदावन,काउंसिल आफ सेकेंडरी एजुकेशन मोहाली, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी, महाशक्ति संस्कृत विद्यापीठ करण बिहार पार्क दिल्ली, भारतीय शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश, बोर्ड आफ सेकेंडरी संस्कृत एजुकेशन यूपी, हिंदी साहित्यसम्मेलन इलाहबाद, मुंबई हिंदी विद्यापीठ, डा.रामगोपालाचार्य संस्कृत महाविद्यालय यूपी, बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन मध्य भारत ग्वालियर, सेकेंडरी एजुकेशन आफ भिवानी पानीपत, वेदामू वैदिक विद्यापीठ बदायूं, दून इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी रायपुर, महात्मा गांधी इंस्टीच्यूट आफ ओपन स्कूलिंग, प्राइवेट स्तर पर चलने वाले अन्य बोर्ड, बॉडीज, विश्वविद्यालय, काउंसिल इत्यादि।